Friday 28 December 2007

आंतकवाद के लिए अमेरिका और पाकिस्तान दोषी

अफगानिस्तान के बाद अमेरिका रासायनिक हथियार और अलकायदा को मदद करने के नाम पर इराक को तबाह कर दिया और राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी। जो आरोप लगाये गये सद्दाम पर, उन्हें अमेरिका सिद्ध नहीं कर पाया। ऊपर से युद्ध मे हो रहे खर्च इराक के तेल कुएं से तेल बेच कर पूरे किये जा रहे हैं। इतने जघन्य अपराध के लिए अमेरिका को बोलने वाला कोई नहीं। इसका मुख्य कारण है कि अमेरिका विश्व की एकमात्र सुपर पावर रह गया है। इसके अलावा कोल्ड वार के दौरान इराक अमेरिका के साथ रहा, इसलिए अमेरिका-विरोधी कोई देश खुलकर नहीं बोल पाया। ईरान को भी अमेरिका मारने की पूरी तैयारी कर ली है लेकिन कोल्ड वार के दौरान ईरान रूस के साथ था। इसलिए ईरान के खिलाफ युद्ध की भूमिका बना रहे अमेरिका को उस समय तगड़ा झटका लगा जब अमेरिका की ओर से प्रतिदिन हो रहे धमकी भरी बयानबाजी के दौरान रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने ईरान का दौरा किया और सुरक्षा संबंधी समझौता किया। अब अमेरिका ईरान के खिलाफ संभल कर बयान दे रहा है।

अमेरिका अपने मित्र देश रहे इराक को खत्म कर दिया। अब बारी है पाकिस्तान की। पाकिस्तान को आज तक भरपूर मदद कर रहा है अमेरिका, लेकिन अब उस पर कड़ी नजर रख रहा है क्योंकि पाकिस्तान आंतकवादियों के लिए अफगानिस्तान से अधिक सुरक्षित जगह है। अमेरिकी सैनिक आज तक अफगानिस्तान में है, लेकिन उनकी तैनाती पाकिस्तान में इस वक्त संभव नहीं। ऐसे में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सीमावर्ती इलाके के दुर्गम क्षेत्रों मे रहे रहे अलकायदा के सरगना को पकड़ना कोई आसान काम नहीं है। क्योंकि पाकिस्तानी सैनिक जहां अमेरिका के रहमोकरम पर है वहीं पाकिस्तानी जनता अब अमेरिका के खिलाफ है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इसका फायदा अवाम के बजाय आतंकवादी संगठन उठा रहे हैं।

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि आंतकवादियों ने पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को ही उड़ा दिया। बताया जा रहा है कि बेनजीर की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह अमेरिकी समर्थक थी। इससे अंदाजा लगा सकते है कि परमाणु संपन्न देश पाकिस्तान में अलकायदा और अन्य आतंकवादी संगठन कितनी गहरी पैठ बना चुका है। जिस आतंकवाद को पाकिस्तान ने पाला पोसा और जगह दी, आज वही उसे निगल रहा है। ये तो होना ही था। आज बेनजीर जैसी बढिया नेता मारी गई, कल कोई और मारा जायेगा। वहां के शासक ने आंतकवाद का जो बीज बोया है उसकी कीमत अब वहां की आवाम को भी चुकानी पड़ रहा है। हालात गंभीर हैं।

स्थिति को देखते हुए अमेरिका परमाणु संपन्न पाकिस्तान को खुला छोड़ने को तैयार नहीं और वहां की अवाम और आंतकवादी अमेरिका को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। ऐसे में पाकिस्तान गृह युद्ध की और बढ जाए तो गलत नहीं होगा। अनुमान यह भी लगाया जा रहा है हालात को देखते हुए कि यदि भविष्य में पाकिस्तान का एक और विभाजन हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

पाकिस्तान में नहीं रुकेगा हत्याओं का सिलसिला

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या से दुनियां में सनसनी फैल गई। उन्हें आज लरकाना में दफना दिया गया। लेकिन यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है क्योंकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और पाकिस्तान के एक और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आंतकवादियों के निशाने पर हैं। इन लोगों पर भी जानलेवा हमला हो चुका है। पूरा पाकिस्तान हीं आंतकवादियों की चपेट में है। इसका खामियाजा पूरी दुनियां को झेलना पड़ेगा।

अब सवाल यह है कि आंतकवाद के लिये क्या सिर्फ पाकिस्तान ही दोषी है? नहीं, इसके लिये पाकिस्तान के अलावा और कोई दोषी है तो वह है अमेरिका। अमेरिका पूरी दुनियां में अपनी पकड़ बनाने की मकसद से हमेशा भारत को परेशान करने के लिये पाकिस्तान को आर्थिक मदद देता रहा। ऱुस और भारत के अलावा चीन ही ऐसा देश है जो अमेरिका की दादागीरी को रोक सकता था इसके लिये अमेरिका को दक्षिण एशिया में एक ऐसे देश की जरुरत थी जहां अमेरिका अपनी दखल रख सके। ऐसे में अमेरिका को पाकिस्तान से अधिक और कोई बेहतर देश नहीं मिल सकता था। क्योकिं अमरीका सैनिक दृष्टि कोण के हिसाब से पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण जगहों पर बसा है।

दक्षिण एशिया स्थित पाकिस्तान की सीमा मध्य पूर्व और मध्य एशिया से मिलता है। इसके दक्षिण में अरब सागर है तो सुदूर उत्तर में इसकी सीमा चीन से मिलती है उसी प्रकार पूर्व में सीमा रेखा भारत से लगी है तो पश्चिम में ईरान और अफगानिस्तान से। पाकिस्तान की आर्थिक हालत खराब है, इसका फायदा उठाते हुये अमेरिका ने पाकिस्तान को यह जानते हुये जबरदस्त आर्थिक मदद करता रहा कि पाकिस्तान आर्थिक मदद में मिले पैसे का इस्तेमाल में देश के विकास में न कर भारत के खिलाफ कर रहा है - चाहे युद्ध की तैयारी में पैसा खर्च कर रहा है या आंतकवादियों को बढावा देने में।

इधर कश्मीर में तबाही के लिए पाकिस्तान की हरकतों को नजरअंदाज करने के साथ साथ अप्रत्य़क्ष मदद करता रहा और उधर रूस को तबाह करने के लिए अफगानिस्तान में खुलेआम अलकायदा के आंतकवादियों को धन और आधुनिक हथियार मुहैया कराता रहा। अफगानिस्तान और पाकिस्तान आंतकवादियों का गढ बन चुका चुका है और अब वहां के आंतकवादी इन देशों में समानांतर सरकारें चला रहे हैं। एक कहावत है कि पाप का घड़ा एक दिन फूटता जरूर है। या इसे इस प्रकार कह सकते है कि यदि बारूद बोओगे तो मौत ही मिलेगी, जीवन नहीं।

अमेरिका के रुख में बदलाव आना शुरू हुआ 11 सितंबर 2001 के बाद, जब अमेरिका में इसी दिन अलकायदा ने हमला कर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो बहुमंजिली इमारत को उड़ा दिया। ऐसा आंतकवादी हमला इससे पहले कभी नहीं देखा गया। सैकड़ो लोग मारे गये। पहली बार अमेरिका को एहसास हुआ कि आंतकवाद क्या होता है। इसी बहाने अमेरिका मुस्लिम दुनिया पर आक्रमण करने की आक्रामक नीति अपना ली। जिस अफगानिस्तान में अमेरिका ने आंतकवाद को पाला पोसा, साथ ही धन और हथियार मुहैया कराया, उसी अफगानिस्तान में अमेरिका ने इतनी बमबारी की कि लगा जैसे वो विश्व युद्ध लड़ रहा हो। फिर अमेरिका करोड़ों डॉलर खर्च करने के बावजूद अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को नहीं पकड सका या जान बूझकर पकडना नहीं चाहता क्योंकि लगता यही है कि अमेरिका ओसामा के नाम पर उन सभी ताकतवर मुस्लिम देशों को समाप्त कर देना चाहता है जिससे उसे या उसके स्वाभाविक मित्र देशों (स्वाभाविक मित्र मंडली में पाकिस्तान नहीं आता है, पाकिस्तान को सिर्फ अमेरिका अपना काम निकालने में मदद करने वाला मित्र मानता है) को खतरा है।

कोल्ड वार खत्म होने के बाद अमेरिका ने जैसे ही आंतकवादी संगठन को मुहैया कराने वाली धन में भारी कटौती कर दी, वैसे-वैसे अमेरिका और अलकायदा के बीच मतभेद उभरने लगे। बहरहाल, कहा जाता है कि अमेरिका उसे जरूर मारता है जो उसका मित्र है लेकिन स्वाभाविक मित्र नहीं है। स्वाभाविक मित्र मंडली मे यूरोप के कई देशों के अलावा इजरायल है और मित्र में पाकिस्तान और इराक जैसे देश जिनका सिर्फ इस्तेमाल किया जाता है। कोल्ड वार के समय इराक अमेरिकी खेमे मे था इसलिए उसे मालूम था कि इराक के पास कितनी ताकत है। अमेरिका उभर रहे मुस्लिम देश को इस स्थिति में नहीं पहुंचने देना चाहता जो अमेरिका या उसके स्वाभाविक मित्र को भविष्य में खतरा पहुंचा सकता है। ऐसे देशों में इराक, ईरान, सीरिया और पाकिस्तान है। पाकिस्तान परमाणु बम संपन्न है। इसकी हालत और बुरी होने वाली है, इस पर आगे चर्चा करेंगे। (जारी...)

Thursday 27 December 2007

आंतकवादी हमले में बेनजीर की मौत ...

पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता बेनज़ीर भुट्टो की एक आंतकवादी हमले में मौत हो गई है. रावलपिंडी में आयोजित बेनजीर की एक रैली में ये आत्मघाती हमला हुआ है जिसमें कम से कम 50 लोग मारे गए हैं और अनेक घायल हुए हैं। इसी हमले में बेनजीर को भी विस्फोट के छरे लगे और इसके बाद उनपर गोलियां भी चलाई गई जो उनके गर्दन में लगी।विस्फोट के छरे और गोली लगने से घायल बेनजीर को पहले हॉस्पीटल ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई।शाम को 6:16 बजे भुट्टो की मौत हो गई। बेनज़ीर आठ जनवरी को होने वाले चुनाव के लिए प्रचार कर रही थीं ।वे कई वर्षों की राजनीतिक निर्वासन के बाद इसी साल के अक्तूबर में ही स्वदेश लौटी थीं। अक्तूबर में वापसी के बाद कराची में बेनज़ीर भुट्टो की एक विशाल रैली में भी भीषण बम विस्फोट हुए थे जिसमें लगभग 125 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी और अनेक घायल हुए थे। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के समर्थकों की एक रैली में भी गोलीबारी हुई है जिसमें कम से कम चार लोग मारे गए और तीन अन्य घायल हो गए. उस रैली में नवाज़ शरीफ़ नहीं थे। नवाज़ शरीफ़ ने बेनजीर की हत्या के लिये राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को ज़िम्मेदार ठहराया है.
जीवन का सफ़र -बेनज़ीर भुट्टो का जन्म 1953 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत हुआ था. इनका परिवार पाकिस्तान का सबसे मशहूर राजनीतिक परिवार रहा है. बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सत्तर के दशक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे. इनके पिता को फांसी दे दी थी वहां की सैन्य सरकार ने। बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का तख़्तापलट जनरल ज़िया उल हक़ ने 1977 में किया था और गिरफ़्तारी के दो साल बाद भुट्टो को फांसी दे दी गई थी ।बहरहाल बेनज़ीर ने उच्च शिक्षा प्राप्त की अमरीका के हार्वर्ड और ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालयों से। बेनज़ीर दृढ़ निश्चय वाली महिला थी। उनके पिता को फांसी दिए जाने से कुछ समय पहले बेनज़ीर को गिरफ़्तार किया गया और उन्हें पांच साल तक जेल में बिताने पड़े थे.उन्होने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) का गठन की थी लंदन में उस समय जब इलाज के लिये जेल से बाहर आया जाया करती थी। इस पार्टी के बैनर तले उन्होने जनरल जिया के खिलाफ आंदोलन शुरु की थी। लंदन से 1986 में पाकिस्तान से वापस आ गई थी। 1988 में एक विमान में हुए बम धमाके में ज़िया उल हक की मौत के बाद वो पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. बेनज़ीर भुटुटो दो बार प्रधानमंत्री बनी 1988-90 और 1993-96 में। उनके पति आसिफ़ ज़रदारी की प्रशासन में अहम भूमिका रहती थी. इस कारण उन्हें कई बार कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा। दोनो पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हालांकि उनके खिलाफ कोई भी आरोप सिद्द नहीं हो पाया। लेकिन जरदारी को 10 साल जेल में बिताने पड़े। वे 2004 मे रिहा हूये। पाकिस्तान सरकार के साथ हुए हाल के समझौते के तहत बेनज़ीर को कई मामलों में आममाफ़ी दे दी गई थी. बेनजीर पाक प्रशासन से परेशान हो कर 1999 में पाकिस्तान छोड़कर दुबई चली गई थी जहां वे अपने पति और तीन बच्चों के साथ रह रही थी। उनका भाई मुर्तजा पिता को फ़ांसी दिए जाने के बाद वह अफ़गानिस्तान चले गए थे. इसके बाद कई देशों मे रहे और उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य शासन के खिलाफ़ अल-ज़ुल्फ़िकार नाम का चरमपंथी संगठन बनाकर अपना अभियान चलाया करते थे लेकिन उनकी भी पाकिस्तान लौटने पर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। बेनज़ीर के दूसरे भाई शाहनवाज़ भी 1985 में अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे. बहरहाल बेनज़ीर भुट्टो लगभग आठ साल बाद इस साल 18 अक्तूबर को पाकिस्तान वापस आई थीं. लेकिन बेनज़ीर भुट्टो के स्वदेश लौटने के बाद कराची में उनके काफ़िले में दो बम धमाके हुए जिनमें 125 लोग मारे गए हैं और लगभग 300 लोग घायल हुए हैं. उस हमले में बेनज़ीर बाल-बाल बच गई थीं।

पाकिस्तान को डर है कि दाउद भारत में सरेंडर कर सकता है

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को डर है कि कहीं अंडरवर्लड डॉन दाउद इब्राहिम उसे छोड कर खुद को भारत के हवाले न कर दे। दाऊद के सरेंडर के डर से आईएसआई ने उसके परिवार समेत पाकिस्तान से बाहर जाने पर रोक लगा दी है।इसी रोक की वजह से दाऊद हाल ही में अपने एक खास साथी की बेटी के निकाह में अपने परिवारवालों को नहीं ले जा सका। ये दाऊद का वो साथी है, जिसे उसका दाहिना हाथ माना जाता है और डी कंपनी का काला कारोबार उसी की देखरेख में चलता है। ओमान- खाडी का एक देश। ये वो जगह है जहां हाल ही में एक जश्न आयोजित किया गया था। ये मौका था डी कंपनी के एक खास शूटर की बेटी की निकाह का। ये शूटर अंडरवर्लड में दाऊद का दाहिना हाथ माना जाता है और वो चाहता था कि बॉस अपने पूरे परिवार के साथ शादी में शरीक हों, लेकिन आईएसआई ने उसकी मंशा पर पानी फेर दिया।
आईएसआई ने दाउद को तो इस कार्यक्रम मे हिस्सा लेने के लिए जाने तो दिया लेकिन उसके परिवार और डी कंपनी के बाकी सदस्यों को पाकिस्तान में ही बंधक बनाए रखा. यानी जब तक दाउद पाकिसातान नहीं लौटा, उसके लोगों को पाकिसातान से बाहर नहीं जाने दिया गया।दरअसल जिस छतरी के नीचे दाऊद इह्राहिम ने पनाह ली, अब वही उसके लिये कैदखाना बन गया है। दाऊद इब्राहिम के परिवार का कोई सदस्य अगर पाकिस्तान से बाहर है, तो दाऊद पाकिस्तान छोड कर बाहर नहीं जा सकता और अगर दाऊद खुद पाकिस्तान से बाहर जाता है तो उसके कुनबे को पाकिस्तान छोडने की इजाजत नहीं है। जी हां, जिस अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम से मुंबई खौफ खाती है और तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां जिसे अपनी गिरफ्त में लेने को बेताब हैं, उस दाउद इब्राहिम पर ये बंदिशें लगाईं हैं उसे पनाह देने वाली पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई ने। डॉन की यही मजबूरी ओमान में निकाह के इस मौके पर सामने आई।
दाऊद के लिये इस शादी में सपरिवार शामिल होना काफी अहमियत रखता था। अंडरवर्लड में माना जाता है कि दाऊद की सल्तनत खडी करने में इस शूटर ने अहम भूमिका निभाई। अब भी दाऊद का काला कारोबार उसी की देखरेख में चलता है।पर आईएसआई की ओर से लगाई गई बंदिशों की वजह से दाऊद उसकी बेटी की शादी में अपने परिवार के बाकी सदस्यों को नहीं ले जा सका। दरअसल 2001 तक दाऊद दुबई में ही रहता था। पर 2001 में world trade centre पर हुए आतंकवादी हमले के बाद दुनियाभर में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने आतंकवाद के खिलाफ दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस वक्त तक दाऊद भी एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया जा चुका था, क्योंकि 12 मार्च 1993 को हुए मुंबई बमकांड में उसकी भूमिका की बात भारत ने दुनिया को बता दी थी। दाऊद दुबई में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा और उसने पाकिसातानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से मदद की गुहार लगाई। आईएसआई के लिये भी दाऊद को बचाना जरूरी था क्योंकि दाऊद न केवल आईएसआई का राजदार था, बल्कि भारत में आतंकवादी गतिविधियां चलाने के लिये उसका एक अहम प्यादा भी। इसलिये आईएसआई ने उसे कराची में पनाह दे दी...पर अब आईएसआई चिंतित है। उसे लग रहा है कि दाऊद खुद को कहीं भारत सरकार के सामने सरेंडर करके उसके काले कारनामों की पोल न खोल दे।ऐसी हालत में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पाकिस्तान की बडी फजीहत होगी। दाऊद अबसे चंद साल पहले भारत के मशहूर वकील राम जेठमलानी को फोन करके कुछ शर्तों के साथ सरेंडर करने की पेशकश कर चुका है। उसका एक भाई इकबाल कासकर भी अब भारत में है और मुंबई पुलिस कासकर को अदालत में दोषी नहीं साबित कर पाई। ये सारी बातें इशारा करतीं हैं कि दाऊद अब वापस भारत लौटना चाहता है।
सवाल ये खडा होता है की दाउद और आईएसआई के बीच के अनबन की ये शुरुवात है या डर. लेकिन एक बात तो साफ है की अब डाँन के लिए पाकिस्तान मे भी सबकुछ ठीक ठाक नही है।

Tuesday 25 December 2007

मोदी विजयी कांग्रेस-भाजपा सहित हिन्दू संगठन चारो खाने चित

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात विधान सभा चुनाव में शानदार वापसी कर एक इतिहास रच दिया है। ये इतिहास इसलिये नहीं है कि भाजपा की पुन: एक बार फिर सत्ता में वापसी हुई है। इतिहास इसलिये है कि हिन्दुत्व की राजनीति में पहली बार एक व्यक्ति हिन्दू संगठनों पर भारी पड़ा। इस चुनाव में भाजपा के वरिष्ट नेता लाल कृष्ण आडवाणी को छोड़ कर किसी ने भी नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चुनाव प्रचार नहीं किया। यहां तक भाजपा के सबसे बडे नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी मौन रहे। जब समाचारो में यह बात आने लगी कि श्री वाजपेयी हिमाचल में भाजपा को जीताने की अपील कर रहे हैं लेकिन गुजरात में नहीं तब जाकर श्री वाजपेयी गुजरात विधान सभा चुनाव के दूसरे चरण से पहले एक लाइन का यह मैसेज दिया कि भाजपा को वोट करें। वास्तव में नरेन्द्र मोदी ने लाल कृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली को छोड कर अन्य किसी भी नेता को महत्व हीं नही दिया चाहे वे श्री वाजपेयी हों या भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह। इतना हीं नहीं विश्व हिन्दू परिषद और संघ का एक बडा धड़ा मोदी विरोधी रहा। गुजरात भाजपा के नेता तो मोदी के खिलाफ ही प्रचार कर रहे थे बावजूद मोदी ने अपने ही घर के राजनीतिक दुश्मनों के साथ कॉग्रेस को हरा दिया। ये शुद्ध रुप से मोदी की जीत है। अब भाजपा की मजबूरी है कि मोदी की जीत को भाजपा की जीत बताये। इतनी बडी जीत के बाद भी भाजपा नेताओं के चेहरे पर वो खुशी नहीं दिख रही है जो पहले दिखा करता था।
चुनाव परिणाम आने के बाद आकलन शुऱु हो गया कि आखिर क्या वजह है कि नरेन्द्र मोदी को शानदार सफलता मिली। इस पर आगे चर्चा करेंगे उससे पहले जो सवाल पैदा हो रहे थे कि नरेन्द्र मोदी जीत भी सकते और हार भी सकते है उसके कारण क्या थे – 1. भाजपा की एकता तार तार हो चुकी थी. गुजरात के प्रमुख भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री केशू भाई पटेल समेत दर्जनों नेता मोदी के खिलाफ प्रचार कर रहे थे। 2.आडवाणी को छोड़ भाजपा के सारे वरिष्ठ नेताओं को चुनाव प्रचार के मुख्य धारा से बाहर ऱखा गया।यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता को भी महत्व नहीं दिया गया।.3. संघ और विश्व हिन्दू परिषद का मोदी के समर्थन करने के वजाय मौन रहना 4. गुजरात दंगे के लिये दुनियां भर में निंदा .5. इस बार कॉग्रेस और एनसीपी का मिलकर चुनाव लड़ना। 6.लगातार सत्ता में बने रहने से विरोध लहर की उम्मीद 7.चुनावी प्रचार के समय सीडी का जारी होना जिसमे गुजरात दंगे के लिये मोदी को साफ तौर पर दंगा संरक्षक दिखाया गया. आदि.

इतने के बावजूद नरेन्द्र मोदी चुनाव क्यों जीते? आम तौर पर यही कहा जाता है कि 1. नरेन्द्र मोदी ने राज्य में विकास का काम किया है और 2.चुनाव प्रचार में आक्रमक नीति अपनाई। विकास मुद्दा होता तो उनके आधा दर्जन मंत्री चुनाव नहीं हारते। सिर्फ इतने से कोई चुनाव नहीं जीत सकता । गुजरात दौरे पर गये पत्रकार, विभिन्न दलो के राजनीतिज्ञ और कुछ सामजिक लोगों से बातचीत करने के बाद जो निष्कर्ष निकाले गये उससे यही लगता है कि नरेन्द्र मोदी का जीतना तय था। जिसे लोग समझने में भूल कर बैठे। मोदी ने प्रचार के लिये ठेठ गवई , आक्रमक और लालू यादव की प्रचार शैली को अपनाया। मोदी जहां भी गये वे अपने भाषण के दौरान लोगों को अपने पक्ष में मतदान करने के लिये समझाते रहे नीतिगत भाषण के अलावा। जैसे – प्र. आप किसको जीतना चाहते हैं उ. आपको आपको ... मुझे जिताने के लिये सिर्फ नारे लगाने से काम नहीं चलेगा। आपको मन मजबूत कर बूथ पर जाना होगा थोडा़ कष्ट सहकर लाइन में लगकर वोट करना होगा। वोट अब इलेक्ट्रोनिक मशीन से होता है इसलिये सावधानी से देखना होगा और जहां कमल का निशान होगा वहां बटन दबायेंगे तभी आपका मोदी भाई मुख्यमंत्री बनेगा। ये सारी बाते नरेन्द्र मोदी गुजराती में अपने समर्थकों से अपील करते रहे। यह पहला मौका था कि जब वर्ण व्यवस्था के तहत समाज के कमजोर वर्ग के लोगों ने मोदी ( भाजपा को नहीं) को जबरदस्त वोट किया। सूरत के कौशल नारायण राणा जो पिछड़े वर्ग से है। इसका कहना है कि मैं पूरी तरह हिन्दू मुस्लिम दंगों के खिलाफ हूं। गुजरात में जो दंगे हुये मैं इसका बिल्कुल समर्थन नहीं करता। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मैंने भी काम किया। मैं कमल पर मुहर कभी नहीं लगा सकता था लेकिन जैसे ही मुझे मालूम चला कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सारे लोग हैं चाहे अटल बिहारी वाजपेयी हों या राजनाथ सिंह या विश्व हिन्दू परिषद या संघ। वो भी इसलिये कि वे नहीं चाहते थे कि पिछड़े वर्ग का कोई नेता भाजपा के शीर्ष कमांड संभालने की स्थिति में हो। जैसा कल्याण सिंह के साथ श्री वाजपेयी ने किया। उन्होने श्री सिंह को न सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से रोका बल्कि ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि उन्हे पार्टी से निकलने पर मजबूर कर दिया। इस लिये मैंने मोदी को वोट किया। मोदी की जीत में एक बड़ा कारण मोदी का पिछड़े वर्ग का होना भी माना जा रहा है। पिछड़े वर्ग ने मोदी के समर्थन में गोलबंद होकर वोट किया।बहरहाल मोदी ने भले हीं चुनाव जीत लिया हो लेकिन गुजरात में जो निर्दोंष लोगों की हत्या हुई उसके लिये मोदी ही जिम्मेवार हैं। सोहराबुद्दीन एनकांउटर को लेकर जो खेल नरेन्द्र मोदी ने खेला वह कतई उचित नहीं। सोहराबुद्दीन अपराधी था उसे पुलिस ने मार गिराया एक हद मान लिया जाये कि यह सही है लेकिन उसकी पत्नी का क्या कसूर था। गवाह प्रजापति का क्या कसुर था कि उन्हे क्यों मार गिराया गया?

Tuesday 18 December 2007

प्रवीण महाजन को उम्र कैद की सजा

बीजेपी नेता प्रमोद महाजन की हत्या के जुर्म में मुंबई सेशंस कोर्ट ने उन्ही के भाई प्रवीण महाजन को उम्रकैद की सजा और कुल 20 हजार की जुर्माना सुनाई है। अदालत ने कल ही उन्हें इस मामले में दोषी घोषित किया था। सजा सुनाये जाने से पहले बचाव पक्ष और मुंबई पुलिस के वकीलों के बीच कडी बहस हुई। प्रवीण महाजन को जब सेशंस कोर्ट के जज श्रीहरि डावरे ने जब उम्रकैद की सजा सुनाई तो उनके चेहरे पर न तो कोई दुख था और न ही कोई घबराहट। मानो इस सजा के लिये वे पहले से ही तैयार थे। सोमवार को ही अदालत ने उन्हें बीजेपी नेता प्रमोद महाजन की हत्या का दोषी करार दिया था। सजा सुनाये जाते वक्त अदालत में खचाखच भीड थी। पत्रकारों, पुलिसकर्मियों के अलावा अदालत में प्रवीण महाजन की पत्नी सारंगी भी मौजूद थीं। प्रवीण को उम्रकैद की सजा सुनाये जाते ही वो रोने लगीं। वहां आये प्रवीण के बाकी रिश्तेदारों ने उन्हें संभाला। प्रवीण महाजन को धारा 302 और धारा 449 के तहत उम्र कैद और कुल 20,000 का जुर्माना सुनाया गया है। अदालती कार्रवाई की शुरूवात मुंबई पुलिस के वकील उज्जवल निकम और बचाव पक्ष के वकीलों के बीच गर्मागर्म बहस से हुई। मुंबई पुलिस ने अदालत से कहा कि प्रवीण महाजन ने जो अपराध किया है, उसके लिये फांसीं से कम सजा नहीं दी जा सकती। प्रमोद महाजन एक बडे कद के नेता थे और प्रवीण ने सुनियोजित ढंग से उनकी हत्या की। ये बात अदालत में साबित हो चुकी है, इसलिये सजा सुनाये जाते वक्त कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिये।
अदालत में ये बात साबित हो चुकी है कि 22 अप्रैल 2006 को प्रवीण महाजन ने अपने भाई प्रमोद के वर्ली इलाके के फ्लैट में जाकर उनपर गोलियां बरसाईं। इसके बाद उसने खुद को वर्ली पुलिस थाने में सरेंडर कर दिया। 13 दिनों तक मौत से जूझने के बाद आखिरकार प्रमोद महाजन ने दम तोड दिया। इस मामले में मुंबई पुलिस ने मुकदमें के दौरान कुल 34 गवाहों को अदालत के सामने पेश किया, जिसमें प्रमोद महाजन की पत्नी रेखा और नौकर महेश वानखेड़े भी शामिल थे, ये दोनों लोग वारदात के वक्त प्रमोद महाजन के फ्लैट में मौजूद थे, इन दोनों गवाहों के साथ ही उस इंसपेक्टर ने भी गवाही दी जिसके सामने प्रवीण ने खुद को सरेंडर किया था। हालांकि पुलिस का केस काफी मजबूत था लेकिन बचाव पक्ष ने भी इस बात की पूरी कोशिश की, कि प्रवीण महाजन को फांसीं की सजा न मिले। सजा में नरमी बरतने की मांग करते हुए बचाव पक्ष के वकील ने जज से कहा कि प्रवीण के 3 आश्रित हैं। पत्नी सारंगी के अलावा उनके 2 बच्चे हैं। प्रवीण ही अपने परिवार के लिये रोजी रोटी जुटाने का आधार हैं। उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। इसलिये उन्हें फांसीं न दी जाये। अदालत ने प्रवीण महाजन को Indian Penal Code की धारा 302 और 449 के तहत दोषी करार दिया है। इसका मतलब है कि अदालत ने ये माना कि प्रवीण 22 अप्रैल की सुबह प्रमोद महाजन की हत्या के इरादे से ही उनके घर में घुसे थे। धारा 302 के तहत अधिकतम सजा फांसीं की है और धारा 449 के तहत 10 साल कैद-ए-बामशक्कत।
प्रवीण महाजन को फांसीं की सजा दिये जाने की मांग पर अदालत के सामने ये सवाल खडा हुआ कि क्या उसका किया हुआ जुर्म rarest of rare crime के दर्जे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेशों में इस बात पर जोर दिया है कि फांसीं की सजा उन्ही गुनहगारों को दी जानी चाहिये, जिन्होने इतने गंभीर अपराध किये हों, जो आम तौर पर नहीं होते। प्रवीण महाजन के मामले में भी अदालत को ये देखना था कि क्या उनका जुर्म rarest of rare crime की परिभाषा के दायरे में आता है। कोर्ट ने कहा नहीं ये मामला rarest of rare crime की परिभाषा के दायरे में नहीं आता है।
प्रवीण महाजन ये कानूनी लडाई हार चुके हैं, लेकिन सेशंस कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ वे बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। आर्डर की कॉपी हाथ लगते ही उनके वकील हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

Tuesday 11 December 2007

न्यायाधीशों को सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए - सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर को कहा कि न्यायपालिका को अपनी सीमा नहीं लाँघनी चाहिए और न्यायाधीशों को सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और न हीं राजाओं की तरह व्यवहार करनी चाहिये। न्यायमूर्ति ए के माथुर और न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की पीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक फैसले को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। फैसले में हरियाणा सरकार को ट्रैक्टर ड्राईवर के पद सृजित करके प्रतिवादी चंद्रहास और अन्य को नियमित करने को कहा गया था। उन्होंने कहा है कि न्यायाधीशों को अपनी सीमाएँ समझनी चाहिए और सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को विनम्रता से काम लेना चाहिए। दोनो न्यायधीशों नेन्यायमूर्ति माथुर और न्यायधीशों ने नीतिगत मामलों में भी न्यायपालिका के हस्तक्षेप की आलोचना की और कहा कि अदालतों ने हाल में कार्यपालिका और नीति संबंधी मामलों में भी अगर साफ-साफ नहीं तो जाहिरा तौर पर ऐसा ही किया है। जबकि संविधान के तहत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन है।न्यायालय ने कहा कि अंतरिम आदेश 'उत्तर प्रदेश में 1998 के जगदंबिका पाल मामले और 2005 में झारखंड के मामले में' संविधान के तहत शक्ति के विभाजन से विचलन का जीता-जागता उदाहरण है।पीठ ने कहा अगर कानून है तो न्यायाधीश उसे लागू करने का आदेश दे सकते हैं। लेकिन वे कानून नहीं बना सकते और न ही ऐसा करने का निर्देश दे सकते हैं। शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए 22 पृष्ठ के अपने फैसले में यह बात कही।बहरहाल पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएस आनंद ने न्यायालय की टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि न्यायिक अनुशासन के तहत बड़ी पीठ के आदेश छोटी पीठ पर लागू होते हैं। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि न्यायिक अनुशासन का हर कोई पालन करे। संवैधानिक विशेषज्ञों ने भी कहा है कि दो सदस्यीय पीठ बड़ी पीठ के आदेश पर टिप्पणी नहीं कर सकती। बड़ी पीठ के आदेश छोटी पीठ के लिए बाध्यकारी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय ने स्वयं ही यह व्यवस्था दी थी कि अगर छोटी पीठ बड़ी पीठ के आदेश से इत्तफाक नहीं रखती है तो उन्हें मामले को बड़ी पीठ के पास भेज देना चाहिए। फैसले में न्यायमूर्ति आनंद के हाल की उस टिप्पणी का भी जिक्र किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि अदालत उस अधिकार को उत्पन्न नहीं कर सकती है जो मौजूद ही नहीं है और न ही ऐसे आदेश दे सकती है जिसे लागू ही नहीं किया जा सकता या वह अन्य कानून या फिर तय कानून सिद्धांतों का उल्लंघन करता हो।

Friday 23 November 2007

कम कपड़े पहन पैसा कमाने वाले मॉडलों पर प्रतिबंध क्यों नहीं ?

फिल्म हीरोईन बिपाशा बसु को एशिया की सबसे सेक्सी महिला चुना गया है। ये दावा है ब्रिटिश पत्रिका ‘ईस्टर्न आई’ का। बिपाशा कम कपड़े पहन कर धमाल करती रहती हैं। लोग उसे सेक्सी गर्ल कहते हैं। बिपाशा कम कपडे पहन कर पैसा कमाती रहती है। वे कम कपड़े पहने लेकिन अपने घर में तो किसी को एतराज नहीं होगा। लेकिन टीवी और पत्रिकाओं के लिये जो शॉट्स देती हैं उसे क्या कहेंगे? कुछ लोग उसे वेश्यावृति का हीं एक हिस्सा मानता हैं। बारबालाओं के डांस पर रोक तो लगायी जा सकती है लेकिन बिपाशा जैसी मॉडल पर रोक लगाना किसी सरकार की बस मे नहीं क्योंकि मंत्री या अधिकारी बनते हीं लोग हाई प्रोफाइल हो जातें हैं। उन्हें लगता है कि फाइव स्टार जैसे हॉटल में साक्षात्कार डांस देखने का मौका उन्हें भी मिल जायेगा। एक नज़र एशिया की सबसे सेक्सी महिला पर ..









न्यायलय पर आंतकवादी हमला, 11 की मौत

उत्तर प्रदेश के तीन के शहरों लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में जबरदस्त धमाके से 11 की मौत हो गई और 35 से अधिक लोग घायल हैं।। इस घटना के बाद चारो ओर अफरातफरी का माहौल है। इन धमाकों में साइकिल बम का इस्तेमाल किया गया है। अनुमान लगया जा रहा है कि साइकिल में रखे काले बैग के अंदर विस्फोटक था जिसे टाइमर के मार्फत विस्फोट किया गया। क्योंकी तीनों धमाके पांच मिनट के अंतराल पर हुई। धमाका 1:15 बजे से लेकर 1:20 के बीच हुई । ये धमाके कोर्ट परिसर में की गई है। माना जा रहा है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में पकड़े गये आंतकवादियों से सीधे इनके संपर्क हैं। अदालत में पेशी के दौरान वकीलों ने आंतकवादियों की पिटाई कर दी थी ये धमाक उसी का बदला बताया जा रहा है। बहरहाल ये मामला उत्तर प्रदेश एसटीएफ को सौंप दिया गया है। और देश की राजधानी दिल्ली सहित प्रमख शहरों में सुरक्षा व्यवस्थ बढा दी गई है।

Wednesday 21 November 2007

क्या ये वेश्यावृति नहीं है ?

‘मैक्सिम’ पत्रिका ने याना की तस्वीर कवर पृष्ट पर प्रकाशित किया है और उनके ये तस्वीर काफी चर्चित हैं बाजार में। प्रकाशित उनका साक्षात्कार काफी हॉट है। याना इन दिनों लंदन में है और मैक्सिम पत्रिका के लिये हॉट तस्वीरें खीचवा रही है। याना का मानना है कि लंदन हॉट तस्वीरें खींचवाने के लिये दुनियां में उपयुक्त जगह है। भारतीय मॉडल कम कपड़े पहनने में महारत हासिल कर रहीं हैं। उन्हें आम लोगों के सामने सेक्सी प्रदर्शन करना अच्छा लगता है। देश- दुनियां की गरीब लड़कियां जिश्म के धंधे में पकड़ी जाती हैं तो उन्हें जो सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है।पुलिस भी परेशान करती है। लेकिन इन तथाकथित नामी मॉडल का क्या करेंगे जो अंग प्रदर्शन कर धन कमा रहीं हैं। देखिये नीचे दिये गये तस्वीर में।






Tuesday 20 November 2007

हिल्टन मुसीबत में सेक्स टेप के कारण

अमेरिकी मॉडल एवं हिल्टन होटल समूह की उत्तराधिकारी पेरिस हिल्टन ने जेल की सजा काटने के बाद भले ही विवादों से दूर रहने की कसम खाई हो लेकिन एक सेक्स टेप के चलते वह एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं।एक वेबसाइट द्वारा इंटरनेट पर जारी एक फुटेज में हिल्टन एक बड़े बाथ-टब में नहाते हुये पानी से खेल रही हैं। हिल्टन ने वेबसाइट के खिलाफ मामला दर्ज कराया है।





सौजन्य - आईएएनएस

Thursday 1 November 2007

पत्रकारों की पिटाई पटना में

पटना - जनता दल (यूनाइटेट) के विधायक अनंत सिंह और उसके गुंडों ने अपने घर पर कुछ पत्रकारों की जमकर पिटाई की। एक लड़की के दैहिक शोषण और उसकी हत्या के मामले में अंनत सिंह के घर प्रतिक्रिया लेने गये एनडीटीवी के संवाददाता प्रकाश सिंह और कैमरामेन हबीब अली के साथ पहले गालीगलौज की गई फिर जमकर मारा पीटा गया।इतना हीं नहीं उनके घर पर जमा हुये पत्रकारों को भी पीटा गया। लोग इधर उधर भाग रहे थे।पत्रकारों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया। घायल पत्रकारों को हॉस्पीटल में दाखिल करा दिया गया है। इस मामले को लेकर राष्ट्रीय जनता दल ने कल बिहार बंद का एलान किया है। राजनीतिक दलों के बंद का एलान और पत्रकारों के दबाव के कारण अंनत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। विधायक अनंत सिंह उन बाहुबलियों में से एक हैं जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के क़रीबी माने जाते हैं। पटना के मौकामा जैसे इलाके में अंनत की तूती बोलती है। इतना अधिक भय है कि पुलिस भी इसपर या इसके गुंडो पर हाथ डालने से डरती है। कई अपराधिक मामले दर्ज हैं लेकिन कोई कुछ नहीं कर पाता है अंनत सिंह का ।
पिछले दिनों रेशमा नामक एक लड़की ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और विधान सभा में विपक्ष की नेता राबड़ी देवी सहित कई राजनीतिज्ञों को पत्र लिखकर जदयू विधायक अनंत सिंह, मुकेश सिंह और विपिन सिन्हा के खिलाफ नौकरी देने के नाम पर दैहिक शोषण का आरोप लगाया था। इसी बीच पटना के हीं शास्त्री नगर में कल शाम लड़की की लाश मिलने से सनसनी फैल गई । बताया जा रहा है कि यह लाश उसी लड़की की है जिसने अंनत सिंह और उसके दोस्तों पर आरोप लगाई थी लेकिन पुलिस ने इसकी पुष्टि नहीं की है । बताया जा रहा है कि सताधारी विधायक होने के नाते पुलिस अंनत सिंह को बचाने में लगी हुई है।

Monday 29 October 2007

स्कूल के दो दोस्त - एक बना कानून का रखवाला दूसरा अंडरवर्ल्ड डॉन

मुंबई अंडरवर्लड के सबसे बडे डॉन दाऊद इब्राहिम को उसी के एक सहपाठी ने नाकों चने चबवाये। मुंबई के उर्दू मीडियम स्कूल में दाऊद ने करीब 6 साल तक उसके साथ पढाई की थी।मैट्रिक पास करने के बाद दाऊद ने गुनाह की राह पकडी, जबकि उसके सहपाठी कादर खान ने पुलिस में अपना करियर बनाया। इंस्पेक्टर कादर खान से बातचीत की जीतेन्द्र दीक्षित ने – एक रिपोर्ट - हम मिले दाऊद के सहपाठी से जो अब भी पुलिस महकमें में है और दाऊद के सबसे बडे दुश्मनों में से एक है।उसने हमें बताया दाऊद के बचपन के दिनों से जुडी कई सारी बातें, जो इस डॉन का एक अलग ही चेहरा पेश करतीं हैं। हम दाऊद के टीचर से भी मिलें और उन्होने जो बातें हमें बताईं उसे सुनकर आप सोचेंगे कि क्या ये वही शख्स है, जिसे आज दुनिया के सबसे खतरनाक आदमियों में गिना जाता है।उन्होने साथ साथ पढाई की, टीचर की डांट खाई, खेले कूदे, लेकिन आज वे है एक दूसरे के जानी दुश्मन। ये कहानी है अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम और स्कूली दिनों में उसके साथी कादर खान की। जहां दाऊद आज गुनाह की दुनिया में बहुत बडा नाम बन चुका है, वहीं कादर खान मुंबई पुलिस में एक सीनियर इंस्पेक्टर है। वैसे मुंबई पुलिस में डी कंपनी के तमाम दुश्मन हैं, लेकिन कादर खान एक ऐसा इंस्पेक्टर है, जिसे दाऊद शायद ही भूल पाये।अंडरवर्लड के खूनी खेल में पुलिस और दुश्मन गिरोहों से निपटने के लिये दाऊद इब्राहिम ने शूटरों की फौज खडी कर रखी थी और इन्ही शूटरों के ट्रेनिंग देने के लिये उसने नियुक्त किया था खुद पुलिस का ही एक आदमी और वो भी पुलिस का एक ऐसा आदमी जो मुंबई पुलिस के हथियार खाने में काम करता था और तमाम तरह के हथियार चलाना जानता था।सीनियर इंस्पेक्टर कादर खान। मुंबई के वडाला पुलिस थाने के इचार्ज। पुलिस महकमें में अपने करियर के दौरान इन्होने कई अपराधों की गुत्थियां सुलझाईं हैं और इनके काम के लिये इन्हें राष्ट्रपति पदक भी मिल चुका है। पर कादर खान की मुंबई पुलिस में एक और पहचान भी है। ये पहचान है अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम के सहपाठी के रूप में। दाऊद के साथ दक्षिण मुंबई के अहमद सेलर स्कूल में इन्होने 6 साल तक पढाई की...पर पुलिस महकमें में मौजूद अपने इस पुराने साथी से दाऊद कोई फायदा नहीं उठा सका। उलटा कादर खान ने दाऊद गिरोह के शूटरों को ट्रेनिंग देने वाले अपने ही महकमें के एक कांस्टेबल को खत्म कर दाऊद को एक करारा झटका दिया। दाऊद के लिये काम करने वाला ये कांस्टेबल था राजेश इगवे उर्फ राजू।अंडरवर्लड के खूनी खेल में पुलिस और दुश्मन गिरोहों से निपटने के लिये दाऊद इब्राहिम ने शूटरों की फौज खडी कर रखी थी और इन्ही शूटरों के ट्रेनिंग देने के लिये उसने नियुक्त किया था खुद पुलिस का ही एक आदमी और वो भी पुलिस का एक ऐसा आदमी जो मुंबई पुलिस के हथियार खाने में काम करता था और तमाम तरह के हथियार चलाना जानता था।-जी हां राजू की पोस्टिंग मुंबई पुलिस के हथियार खाने में की गई थी। कहने को तो राजू एक पुलिस वाला था, लेकिन उसकी खाकी वर्दी के पीछे छुपा था एक खतरनाक अपराधी। पुलिस की नौकरी से मिलने वाला साधारण वेतन इगवे की अय्यशियों को पूरा सकरने के लिये कम पडता था। शराब और शबाब के शौकीन इगवे को चाहिये थी ऊपरी कमाई और उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाया दाऊद इब्राहिम ने। दाऊद जानता था कि राजू को पिस्तौल और रिवॉल्वर से लेकर राईफल, मशीन गन और एके 47 जैसे तमाम अत्याधुनिक हथियार चलाने आते हैं। दाऊद के लिये ये आदमी बडे काम का था। 1991 में दाऊद का एक शूटर माया डोलस मुंबई के लोखंडवाला इलाके में पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था। दाऊद चाहता था कि उसके शूटर दुश्मन गिरोह के शूटरों को तो ठिकाने लगाने में सक्षम हों हीं, जरूरत पडने पर पुलिस वालों पर भी गोलियां बरसाने के काबिल हों। इसी इरादे से मोटी रकम पर उसने राजू इगवे की भर्ती कर ली। इगवे को जिम्मेदारी दी गई डी कंपनी के शूटरों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने की।इस काम के लिये उसने जगह चुनी संजय गांधी नेशनल पार्क के जंगलों को।जिस दौरान राजू इगवे, दाऊद के शूटरों को ट्रेनिंग दे रहा था, उस वक्त कादर खान मुंबई पुलिस की क्राईम ब्रांच में थे। कादर खान मुंबई के उसी नागपाडा इलाके में पले बढे थे, जहां दाऊद का बचपन बीता और जहां से दाऊद उस वक्त भी अपनी आपराधिक गतिविधियां चला रहा था।कादर खान को दाऊद के इस नये ट्रेनर के बारे में पता चला और वे उसके पीछे लग गये। इसी दौरान खान को टिप मिली कि राजू इगवे से दाऊद सिर्फ ट्रेनिंग ही नहीं करवा रहा है, बल्कि उसे दाऊद ने एक बडा मिशन भी सौंप रखा था। ये मिशन था 3 लोगों की हत्या का। ये तीनो लोग थे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और 1993 के मुंबई बमकांड की तहकीकात कर रहे अफसर एम एन सिंह और राकेश मारिया।...पर इससे पहले कि इगवे अपने इस मिशन में कामियाब हो पता वो कादर खान के जाल में फंस गया। 17 नवंबर 1995 में को एक मुठभेड में कादर खान की रिवॉल्वर से निकली गोलियों ने इगवे को छलनी कर दिया।भले ही कादर खान ने दाऊद गिरोह का भारी नुकसान किया हो, लेकिन दाऊद का सहपाठी होना वे अपने लिये एक कलंक मानते हैं। उनके मुताबिक दाऊद का सहपाठी होने की वजह से उन्हे हमेशा शक की नजरों से देखा जाता रहा और कभी कोई संवेदनशील पोस्टिंग नहीं दी गई।वैसे तो दाऊद के सैकडों शूटरों को मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अफसर एनकाउंटर्स में ढेर कर चुके हैं, लेकिन दाऊद ने शायद ही सोचा हो कि खुद उसका एक सहपाठी गुनाह की राह में उसके लिये कांटा बनकर उभरेगा।

Sunday 28 October 2007

कम उम्र की लड़की की मर्जी से सेक्स करना बलात्कार माना जायेगा

लड़कियों की रक्षा के लिये ठोस कदम उठाते हुये, देश के उच्चतम न्यायलय ने कहा है कि 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ उसकी मर्जी से भी सेक्स करना बलात्कार की श्रेणी में आएगा। यदि आप जोर जबरदस्ती के अलावा किसी ऐसी लड़की से प्यार करते हैं और उसकी उम्र 16 साल से कम है और उसके साथ सेक्स करते हैं, भले हीं उसमें लड़की की भी मर्जी हो तो भी आपको बलात्कार के मामले में सजा काटना होगा। इसके अलावा न्यायलय ने एक व्यवस्था और दी है कि किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति में धकेलने का दोषी तभी माना जाएगा जब वह खुद शारीरिक संबंध न बनाकर लड़की को किसी दूसरे व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाने को मजबूर करता है। और यह मामला आईपीसी की धारा 366 ए के तहत आयेगा। यह मामला जुडा है केरल से जहां एक आरोपी को नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोप में केरल के सेशन कोर्ट ने 3 साल की सजा सुनाई थी।उल्लेखनीय है कि वह लड़की अपनी मर्जी से आरोपी लड़के के साथ फरार हुई थी। लेकिन वहां की निचली अदालत ने बलात्कार के साथ ही उसे वेश्यावृत्ति में धकेलने का दोषी भी पाया था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने उसे सिर्फ बलात्कार का दोषी पाया। लड़की उम्र 16 साल से कम थी।

Friday 26 October 2007

दंगे ने मानवता हीं खत्म कर दी

राजेश कुमार
तहलका पत्निका और आज तक टीवी चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन के तहत गुजरात दंगे के बारे में जो दिखाया उसे हर कोई जानता है लेकिन सबूत किसी के पास नहीं था लेकिन टीवी चैनल आजतक में दिखाये जाने के बाद सभी लोगों के लिये यह बहस का मुद्दा बन गया है। भारतीय जनता पार्टी सिर्फ यही रट लगा रही है कि तहलका भाजपा के खिलाफ है इसलिये स्टिंग ऑपरेशन की गई है। कॉग्रेस के खिलाफ तहलका कोई ऑपरेशन क्यों नही करती ? हालांकि तहलका के संपादक तरुण तेजपाल ने कहा है कि उन्होने कॉग्रेस के खिलाफ कितने स्टिंग किये हैं ये सभी जानते हैं। यहां सवाल यह नहीं है कि कौन किसके के खिलाफ है। यहां इस विषय पर बहस होनी चाहिये थी कि गुजरात दंगे को मोदी सरकार ने जिस तरह से बढावा दिया और एक खास समुदाय के लोगो की हत्या करवाई क्या वह सही था? दंगे की सारी राम कहानी किसी दूसरे दल के लोगों ने नहीं बताई बल्कि उन्हीं के पार्टी के लोगों ने ही सब कुछ बताया।उसमें भी वे लोग जो खुद क्रूर घटना को अंजाम दिया। कुछ लोग गुजरात दंगे को गोधरा घटना की प्रतिक्रिया बता रहें है। तो उनसे पहला सवाल यही है कि मुंबई में जो दंगे हुये 1992-93 में उसी की प्रतिक्रिया थी 93 का मुंबई विस्फोट, तो क्या मुंबई विस्फोट को सही ठहराया जा सकता है – नहीं। उसी प्रकार गुजरात दंगे को सही नहीं ठहराया जा सकता। किसी का खून बहाना या क्रूर अत्याचार करना किसी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता।बहरहाल सभी जानते हैं कि चुनाव का समय है राजनीतिक सीडी जारी होते रहेंगे और जिसके खिलाफ स्टिंग होगा वह सच्चाई को ढकने के लिये अपने दुश्मनों का गेम प्लान बतायेंगे।

कहीं ये टीवी पत्रकारिता का कलंक न बन जाये।

जीतेंद्र दीक्षित पत्रकारिता जगत में पिछले 12 साल से कार्यरत हैं। आजतक – तहलका ने जो स्टिंग ऑपरेशन में गुजरात के दंगो को दिखाया उससे वे सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि गुजरात दंगे का अर्ध सच ही दिखाया गया है। एक रिपोर्ट - इस हफ्ते के तहलका का तहलका खूब चर्चित हुआ। गुरूवार की शाम जब आज तक न्यूज चैनल ने गुजरात दंगों पर तहलका के साथ मिलकर अपना स्टिंग ऑपरेशन दिखाया तो हर कोई टीवी से चिपका दिखा। ये जानकर अच्छा लगा कि बडे दिनों बाद कोई हिंदी न्यूज चैनल राखी सावंत, नाग नागिन या अंधविश्वास से हटकर कोई गंभीर खबर दिखा रहा था। राजनेता, पत्रकार , व्यापारी हर कोई इस खुलासे को देखकर अचंभित था। गुजरात के दंगों का ये सच काफी घिनौना और डरावना था। एक हिंदुत्ववादी नेता बडी बहादुरी जताते हुए गर्भवती महिला की हत्या कबूल कर रहा था, दूसरा बूढे मुसलिम सांसद और उसकी पनाह में आये लोगों की हत्या को बहादुरी मान रहा था। तीसरे ने उगला कि किस तरह से पुलिस और मंत्री दंगाईयों का समर्थन कर रहे थे। जो भी सुनाई और दिखाई दे रहा था, उसने दहला कर रख दिया। मरने वालों के लिये कोई नहीं था, न पुलिस, न सरकार और न नेता। वे तस्वीरें लोकतंत्र का मजाक तो थीं हीं, इंसानियत का भी मखौल उडा रहीं थीं। जो भी दिखाया गया वो काफी शर्मनाक था।
इस स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम देने वाले तहलका के पत्रकार आशीष खेतान मेरे अच्छे दोस्त हैं। जिन दिनों वे मुंबई मिरर के लिये मुंबई में काम करते थे तो हमारी अक्सर मुलाकात होती थी। मुंबई से दिल्ली जाने पर भी वे लगातार मेरे संपर्क में थे। इस ऑपरेशन को उन्होने जिस हिम्मत, सूझबूझ और रोचक तरीके से अंजाम दिया, मै उसकी दाद देता हूं। स्टिंग ऑपरेशन के दौरान कई तरह के जोखिम होते हैं, लेकिन खेतान ने इन जोखिमों की परवाह किये बिना ऑपरेशन कलंक को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। मैं इस ऑपरेशन को टीवी पत्रकारिता की एक बडी उपलब्धि मानने वाला था, लेकिन थोडी गहराई से सोचने पर निष्कर्ष निकला कि ऐसा नहीं है।
ऑपरेशन कलंक को आज तक ने गुजरात के दंगों का सच के तौर पर प्रचारित किया, पर मैं इससे सहमत नहीं हूं। जो भी आज तक ने दिखाया वो अधूरा सच था और आधा सच कई बार झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है। इस बात में मुझे शक की कोई गुजाईश नहीं लगती कि तहलका ने जिन लोगों के वीडियो पर बयान दिखाये उनमें किसी तरह की छेडखानी की गई होगी, या उन्हे तोड मरोड कर पेश किया गया होगा। तमाम बयानों को देखने के बाद ये निष्कर्ष भी गलत नहीं है कि नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार ने दंगाईयों को खुली छूट दे रखी थी और उन्हें बचाने की भी कोशिश की। मेरी शंका इससे अलग है। मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि ऑपरेशन कलंक में सिर्फ ऐसे दंगाईयों को ही क्यों नंगा करने के लिये चुना गया जिन्होने मुसलिमों पर हमले किये, वे ही लोग क्यों निशाने पर थे जिन पर गोधरा नरसंहार के बाद हुए दंगों में शामिल होने का आरोप है। ऐसे लोगों को बिलकुल नंगा किया जाना चाहिये था। मानवाता के दुश्मन हैं ये...लेकिन तहलका वालों क्या आप उन लोगों के बारे में क्या कहेंगे जिन्होने गोधरा में रेल मुसाफिरों को जिंदा फूंक दिया। साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बा नंबर एस-6 में कुल 58 लोगों को जिंदा जला दिया गया था, जिनमें 15 महिलायें और 20 बच्चे भी थे। हिंदू दंगाईयों की तरह गोधरा की ट्रेन में आग लगाने वाले भी अपने बचाव में तरह-तरह के तर्क और कहानियां पेश कर रहे हैं। उनपर तहलका को शक क्यों नहीं हुआ। उनकी सच्चाई जानने की कोशिश क्यों नहीं हुई। ट्रेन में आग लगाने वालों से भी कैमरे के सामने उनका इकबाल-ए-जुर्म क्यों नहीं कराया गया।
मेरा तो ये मानना है कि गोधरा में नरसंहार का मामला किसी भी खोजी पत्रकार के लिये अपनी काबिलियत तो जांचने का अच्छा मौका देता है। इस मामले में कई ऐसे उलझे हुए सवाल हैं, जिनके जवाब ढूढे जाने बाकी हैं। गुजरात पुलिस की विशेष टीम ने इस नरसंहार को मुसलिम अपराधियों की एक सुनियोजित साजिश बताया था। रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की ओर से गठित किये गये बैनर्जी पैनल के मुताबिक साबरमती एक्सप्रेस के डिबबे में आग लगाई ही नहीं गई, बल्कि ये तो एक दुर्घटना थी। गुजरात हाईकोर्ट ने बाद में पैनल की रिपोर्ट को नकारते हुए उसे गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित किया। कई और जांचे भी इस मामले में चल रहीं हैं, पर तहलका ने इस घटना के बजाय उसके बाद गुजरात में हुई प्रतिक्रिया को ही अपनी तहकीकात के दायरे में शामिल किया।
तहलका को शाबाशी तब दी जा सकती थी जब लो अपनी जांच के दायरे को बढाकर उसमें पूर्णता लाता, न केवल दंगों बल्कि दंगों का कारण बने गोधरा कांड के दोषियों को भी नंगाकर लोगों को बताता कि देखो इंसान दो अलग अलग धर्मों के बीच बंटकर किस तरह से हैवान बन गया था। ये बताता कि दंगाई चाहे हिंदू हो या मुसलमान उनके बीच नफरत और हैवानियत एक समान थी। ऐसा न करके तहलका ने आधा सच पेश किया है और उसके इस प्रयास को मैं सांप्रदायिकता के खिलाफ भरोसेमंद प्रयास नहीं मानता।
दूसरा सवाल जुडा है इस ऑपरेशन को दिखाये जाने के वक्त से। गुजरात में विधानसभा चुनावों के महीनेभर पहले इस ऑपरेशन को दिखाये जाने से ऑपरेशन की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। बीजेपी और नरेंद्र मोदी को ये कहकर अपना बचाव करने का मौका मिल गया है कि ये ऑपरेशन राजनीति से प्रेरित है और बीजेपी को गुजरात की सत्ता से हटाने की एक साजिश है। मैं न तो बीजेपी का समर्थक हूं और न ही आर एस एस, वी एच पी या बजरंग दल का। ऐसे तमाम संगठनों को मैं इंसानियत के दुश्मन और हिंदुत्व के नाम पर दुकान चलानो वालों की तरह देखता हूं, लेकिन इतना जरूर है कि जब तमाम एनजीओ, स्वयंभू समाजसेवी और मीडिया में हावी तथाकथित सेकुलर लोगों को एकतरफा अभियान चलाते देखता हूं तो बैचैनी होती है।
एक सवाल ये भी है कि एक ओर जब देश का माहौल दिन ब दिन बिगड रहा है तो इस तरह के संवेदनशील ऑपरेशन को दिखाया जाना कितना जायज है। गुजरात के गुनहगारों पर दुनियाभर की नजर है और उनके खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया अभी चल ही रही है। न्यायपालिका पर से भरोसा अभी उठा नहीं है। गुजरात दंगों का ही बेस्ट बेकरी मामला इसकी मिसाल है। मामले की मुख्य चश्मदीद गवाह जाहिरा शेख के बार बार अपने बयान बदलने और तमाम नाटकीय घटनाक्रमों के बावजूद इस कांड के दोषियों को सजा मिली है। ऐसे में इस ऑपरेशन को दिखा कर क्या हासिल होगा ये साफ नहीं हो पा रहा। उलटे चिंता ये हो रही है कि कहीं इस ऑपरेशन के बहाने सांप्रदायिक तत्व फिर एक बार अपना उल्लू सीधा करने में न लग जायें। पता नहीं इस ऑपरेशन की सीडी की कितनी प्रतियां आतंकी संगठन खाडी देशों से फंड जमा करने के मकसद से बनाईं जायेंगीं, ट्रेनिंग कैंपों और कट्टरपंथियों के अड्डों पर मुसलिम युवाओं को भडकाने और दहशतगर्दी का रास्ता अख्तियार करने में इनका कितना इस्तेमाल होगा। हाल में देश के अलग अलग हिस्सों से पकडे आतंकियों के पास से गुजरात दंगों की खौफनाक तस्वीरों वाली कई सीडी बरामद हुईं हैं। ऑपरेशन कलंक की सामग्री तो उनसे भी ज्यादा विस्फोटक है। बेगुनाहों की जान लेने का इरादा रखने वाले न जाने कितने आतंकवादी और फिदायीन ऑपरेशन कलंक को देख कर अपने अमानवीय मकसदों को जायज मानेंगे।
मेरी चिंता यही है कि ऑपरेशन कलंक कहीं टीवी पत्रकारिता के लिये ही कलंक न बन जाये।

Thursday 25 October 2007

दाऊद ईब्राहिम के खिलाफ दाऊद फणसे का बयान

जीतेंद्र दीक्षित
बमकांड के मामले में दाऊद इब्राहिम की भूमिका का सबसे तगडा सबूत है लैंडिंग एजेंट दाऊद फणसे उर्फ टकले का का बयान। इस बयान में टकले ने दुबई में दाऊद और टाईगर के साथ हुई मीटिंग का ब्यौरा दिया और बताया कि किस तरह से वापस भारत लौटने के बाद उसने दाऊद के हुक्म के मुताबिक कोंकण में मौत का सामान उतरवाया। हथियारों और विस्फोटकों की लैंडिंग के दौरान टाईगर मेमन भी मौजूद था। टकला, टाईगर मेमन का लैंडिंग एजेंट था। लैंडिंग एजेंट होने का मतलब है कस्टम और पुलिस के उन तमाम लोगों से तालमेल रखना जिनसे की तस्करी में मदद मिलती है। टकले ने हथियार और विस्फोटको को उतरवाते वक्त भी इनका बखूबी इस्तेमाल किया और इस आरोप में ये कस्टम और पुलिस के अफसर दोषी भी ठहराये गये। यहां तक कि टकले का बेटा सरफराज फणसे भी लैंडिग के मामले में दोषी करार दिया गया।
मुंबई पुलिस के हाथों गिरफ्तारी के बाद दिये गये इकबालिया बयान में टकले ने अपनी, टाईगर मेमन, कस्टम और पुलिस अफसरों की भूमिका भी उगली है। गिरफ्तारी के वक्त टकले की उम्र 60 साल की थी। टकले ने अपने बयान में बताया कि जनवरी 1993 के आखिरी हफ्ते में दुबई से लौटने के 5-6 दिन बाद मैने अपने दोनो पार्टनर रहीम और दादभाई उर्फ शरीफ परकार को दाऊद इब्रराहिम के काम की बात कही तो दोनो ने मंजूरी दे दी। फिर जनवरी के आखिर के लगभग शफी ने मेरे को बताया कि माल आने वाला है तो मै इंतजार करके उन लोगों के साथ लगातार 3 दिन एकलैंडिंग स्पॉट(शेखाडी) गये, लेकिन माल आवने का इंतजाम नहीं हुआ तो मै वापस आ गया। फिर 3 फरवरी की सुबह को रहीम ने बताया कि दादाभाई का फोन आया था कि आज शाम को लैंडिग होनेवाली है। फिर मैने मसला के कस्टम अफसर कदम और नवलकर से बात की और पहले से तय की गई रकम 1 लाख 60 हजार रूपये आपको काम होने के बाद मिल जायेगी ऐसा कहने पर दोनो ने कहा कि ठीक है। तुम अपना काम करो। तुम्हे कोई तकलीफ नहीं होगी। फिर शाम को मैं रिक्शा में बैठकर लैंडिंग की जगह पर इकबाल के साथ पहुंचा।वहीं पर रहीम लांड्रीवाला, निसार, अब्बास, शाहजहां, मुजम्मिल समेत कई लोग हाजिर थे। रात के करीब 10 बजे टाईगर अपने आदमी अनवर, परवेज और 20-25 दूसरे लोगों के साथ वहां पर पहुंचा। टाईगर के साथ 8-10 लोगों ने बाहर पिस्तौल लगा रखी थी।टाईगर और अनवर, रहीम और मेरी तरफ आये। टाईगर ने रहीम से पूछा कि पानी के अंदर कोई ट्रॉलर भेजा या नहीं तो रहीम ने इशारा करके बताया कि वो अक बत्ती वाला ट्रॉलर अपना है। इतने में हमारे एक लडके ने आकर बताया कि कस्टम के लोग आये हैं। मैने देखा कि रोड की तरफ कस्टम इंस्पेक्टर तलवडेकर और गुरव खडे हैं। मैने टाईगर को उनसे जाकर बात करने को कहा। टाईगर ने ुनसे जाकर बात की और 15-20 मिनट बाद टाईगर वापस आ गया। इतने में पानी के अंदर बत्तीवाला ट्रॉलर बत्ती बुझाकर आया और बोला कि बॉम्बे वालों को अंदर बुलाया है। टाईगर और उसके साथ 5-7 लोग जलजी से अंदर जाकर ट्रॉलर पर चढ गये। मैने पहले से चय प्लान के मुताबिक खलील और इकबाल को बोरली से राशिद के ट्रक लाने को भेज दिया। इतने में रहीम ने भी माल उतरवाने के लिये गांव से 35-40 लडके जमा कर लिये। मैं और रहीम वापस किनारे पर आकर खडे हो गये। उसके लगभग आधे घंटे बाद एक ट्रॉलर किनारे पर आया और उसमें से टाईगर और उसके आदमी जलदी जलदी उतरकर किनारे पर आये। उन सबकी पीठ पर एक-दो भरे हुए बैग लटके थे। सब लोगों को टाईगर ने सडक के रास्ते ऊपर भेजा ऐर खुद अपने बैग के साथ पास की एक झोपडी में गया। खट खट की आवाज आने पर जब मैने वहां जाकर देखा तो पाया कि टाईगर अपने साथ के 3-4 लोगों को बंदूकें दे रहा था। इसके बाद उसने सबकी किनारे पर फील्डिंग लगाई। थोडी देर बाद दूसरा ट्रॉलर अंदर से सामान लेकर आया और रहीम ने गांव से जिन लोगों को बुलाया था उनसे माल उतरवाना शुरू हुआ। माल को किनारे लाकर रखने पर मैने देखा कि बोरियों में कुछ बक्सानुमा लिपटा है। इतने में खलील और इकबाल ट्रक लेकर आ गये और सारा सामान ट्रक में चठा दिया गया। इतने में दूसरा ट्रॉलर भी वैसा ही सामान लेकर किनारे पर आया और उस सामान को भी ट्रक पर चढा दिया गया। टाईगर ने बंदबक वाले 2-3 लडकों को पीछे ट्रक पर रखे सामान के पास बिठाया और कुछ लोगों को लकेर टाईगर अपनी जिप्सी में बैठा। मैं भी टाईगर के साथ जिप्सी में बैठा। कुछ देर बाद हम सब वांगणी गांव के पास टीवी टॉवर पर पहुंचे। टाईगर ने अपने आदमियों के अलावा हम सभी को बाहर ठहरने के लिये कहा। वाचमैन ने टाईगर को नीचे भेज दिया। हम सभी एक साईड में बैठ गये। टाईगर के लोगों ने ट्रक पर से सारा सामान नीचे उतारा। थोडी देर बाद टाईगर ने हमें आवाज दी। उसने खाली किये गये बक्सों को बाहर ले जाकर जलाने को कहा। हम जब अंदर गये तो हमने देखा कि टाईगर के आदमी बक्सो को कोल रहे थे और उसमें से राईफल, पिसेतौल, रिवॉल्वर, गोलियां और काला साबुन जैसी कोई चीज निकाल कर बाहर रख रहे थे। टाईगर उन सभी को गिनकर अपनी डायरी में नोट कर रहा था।
दाऊद फणसे के इस इकबालिया बयान को टाडा अदालत ने सही माना। अदालत उसकी भूमिका को देखते हुए उसे फांसीं दिये जाने लायक मान रही थी, लेकिन उसकी उम्र के मद्देनजर उसे सिर्फ उम्रकैद की सजा सुनाई गई। बहरहाल मुंबई की विशेष टाडा अदालत ने अपने आदेश में अंडरवर्लड डॉन दाउद इब्राहिम की भूमिका का खुलासा तो किया ही है, ये भी बात सामने आई है कि दाऊद का भाई अनीस इब्राहिम भी इस साजिश का हिस्सा था। अनीस इब्राहिम का जिक्र साजिश के लिये होने वाली मीटिंगों और संजय दत्त के मामले में आता है। सबूत अनीस इब्राहिम की बॉलीवुड में पैठ का भी खुलासा करते हैं।
दाऊद इब्राहिम के साथ ही उसका भाई अनीस भी था 12 मार्च 1993 को मुंबई में तबाही मचाने का जिम्मेदार। अनीस इब्राहिम की साजिश में भूमिका के सबूत मिलते हैं अन्य आरोपियों के इकबालिया बयानों के जरिये जिन्हें अदालत ने सही माना है। खासकर यहां इजाज पठान नाम के आरोपी का बयान काबिल-ए-गौर है। उसने अपने बयान में बताया -मुंबई में दंगों के बाद दुबई में मुस्तफा दोसा के घर एक मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, मुस्तफा मजनू, यासीन कमजा, हैदर, सलीम तलवार, टाइगर मेमन और याकूब मौजूद थे। मीटिंग में मुंबई दंगों पर चर्चो हो रही थी। ये तय हुआ कि दंगों का बदला लेने के लिये कुछ किया जायेगा । आगे की कार्रवाई अगली मीटिंग में तय होगी, जिसका वक्त सभी को फोन पर इत्तला किया जायेगा। टाईगर मेमन भारत में हथियार भेजने की बात कर रहा था।"
संजय दत्त के मामले में भी अनीस इब्राहिम की भूमिका की बात सामने आती है। लेकिन टाडा अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संजय दत्त ने हथियार अनीस इब्राहिम से नहीं बल्कि फिल्म जगत से जुडे हनीफ और समीर से लिये थे।.
समीर हिंगोरा और हनीफ कडावाला मैगनम वीडियो कंपनी के पार्टनर थे और 80 के दशक से ही दोनो की अनीस इब्राहिम से जान पहचान थी। समीर ने अपने बयान में बताया कि फिल्म के काम के सिलसिले में वो अक्स दुबई जाते रहता था, जहां उसकी मुलाकात दाऊद और अनीस से होती थी। उसने कई सारी फिल्मों के वीडियो राईट्स खाडी देशों के लिये किंग्स वीडियो को बेचे थे, जिसका मालिक अनीस इब्राहिम था। अल मंसूर वीडियो कंपनी में भी उसकी हिस्सेदारी है। हालांकि टाडा कोर्ट ने संजय दत्त पर ये टाडा ये कहकर हटा दिया कि उसने अनीस इब्राहिम से हथियार नहीं लिये लेकिन अदालत ने ये माना कि समीर हिंगोरा, अनीस इब्राहिंम के लिये काम करता था और उसी के कहने पर वो संजय दत्त के घर हथियार और एके-56 राईफलों को पहुंचाने अबू सलेंम के साथ गया। अनीस भी बमकांड के माले में भगोडा आरोपी घोषित किया गया है और गिरफ्त में आने पर उसक खिलाफ भी टाडा के तहत मुकदमा चलाया जायेगा।

Wednesday 24 October 2007

बम विस्फोट में संजय दत्त का कोई हाथ नहीं

फिल्मस्टार संजय दत्त ने अपने परिवार की हिफाजत के लिये एके-56 राईफल ली थी।दत्त के अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम के भाई अनीस से रिश्ते तो थे लेकिन बमकांड की साजिश से उनका कोई लेना देना नहीं था। संजय दत्त को टाडा के तहत दोषी न ठहराये जाने के ये कारण गिनाये हैं टाडा जज पीडी कोदे ने अपने आदेश में। उन्हें अदालत ने सिर्फ आर्मस एक्ट के तहत 6 साल की सजा सुनाई है। इन कागज के पन्नों में संजय दत्त का भूतकाल भी है और उनका भविष्य भी कैद है। वैसै तो टाडा अदालत ने पूरे मुकदमें का आदेश 4340 पन्नो में लिखा है, लेकिन उनमें से ये 88 पन्ने संजय दत्त और उनके साथी आरोपियों से सरोकार रखते हैं। संजय दत्त पर से जब इस अदालत ने टाडा हटाया था तो सभी चौंके थे। इस आदेश में अदालत ने साफ किया कि दत्त पर से टाडा क्यो हटाया गया।
सीबीआई ने संजय दत्त को टाडा के तहत आरोपी बनाया था। सीबीआई का आरोप था कि दत्त भी 12 मार्च 1993 को हुए मुंबई बमकांड की साजिश का हिस्सा थे। उन्होने अंडरवर्लड डॉन अनीस इब्राहिम की ओर से भेजे गये हथियार अपने पास रखे। सीबीआई के मुताबिक ये हथियार उस जखीरे का हिस्सा थे जो दाऊद इब्राहिम ने बमकांड की साजिश को अंजाम देने के लिये भारत भिजवाये थे। पर सबूतो, इकबालिया बयानों और दूसरी गवाहियों का हवाला देकर टाडा जज पीडी कोदे ने साफ किया है कि दत्त पर टाडा लगाना गलत था और वे सिर्फ आर्मस एक्ट के तहत ही गुनहगार हैं।
दत्त परिवार को खतरा- संजय दत्त के अपने इकबालिया बयान से ये साफ होता है कि उन्होने एके-56 राईफल इसलिये रखी क्योंकि उन्हें अपने और अपने परिवार के लिये खतरा महसूस हो रहा था। वे खासकर अपने पिता सुनील दत्त की सुरक्षा के प्रति चिंतित थे, जिन्होने सांप्रदायिक दंगों के दौरान कुछ लोगों से दुश्मनी कर ली थी और जिनपर जोगेश्नरी में एक बार हमला भी हो चुका था। दत्त के इकबालिया बयान में कही गई बातों का दूसरे सबूत भी समर्थन करते हैं।
दत्त बमकांड की साजिश में नहीं- हालांकि ये बात खुद दत्त के अपने इकबालिया बयान में सामने आती है कि उनके और दाऊद इब्राहिम और अनीस के बीच किसी तरह के रिश्ते थे और दुबई में यलगार फिल्म की शूटिंग के दौरान वे उनसे मिले थे, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं सामने आया है कि इस रिश्ते का इस्तेमाल बमकांड की साजिश को अंजाम देने के लिये किया गया। ये बात भी काबिल ए गौर है कि 16 जनवरी 1993 को जब संजय दत्त ने हथियार लिये उस वक्त तक शेखाडी में न तो हथियार उतरे थे और न ही बमकांड की पूरी साजिश तैयार हुई थी। टाईगर मेमन ने 5 मार्च 1993 के बाद ही साजिश का खांका जाहिर किया था। इन सबूतों से ये साबित होता है कि संजय दत्त टाडा के तहत साजिश में शामिल होने के गुनहगार नहीं हैं।
हथियार अनीस से नहीं मिले- सबूतों से ये तो पता चलता है कि संजय दत्त और अंडरवर्लड डॉन अनीस इब्राहिम के बीच रिश्ते थे, लेकिन हथियार भी अनीस से मिले हैं ये बात साबित नहीं होती। अपने परिवार को खतरे का जिक्र दत्त ने फिल्म इडस्ट्री से जुडे 2 शख्स समीर हिंगोरा और हनीफ कडावाल से किया था। इन्ही के बार बार कहने पर दत्त हथियार लेने को राजी हुए। ये हथियार इन्ही ने अबू सलेम के साथ मिलकर दत्त तक पहुंचाये।
हथियार का इस्तेमाल आतंकवादी वारदात के लिये नहीं- सीबीआई का आरोप है कि संजय दत्त ने हथियार ऱखकर टाडा की धारा 5 का उल्लंघन किया है जो कि नोटिफाईड इलाके में हथियार रखने को गैरकानूनी जाहिर करती है, पर जज टाडा जज पी डी कोदे के मुताबिक ये धारा तब ही लागू होती है जब हथियार का इस्तेमाल आतंकवादी वारदात के लिये किया जाने की आशंका हो। संजय दत्त के मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि एके 56 राईफल उन्होने किसी आतंकी वारदात के लिये ऱखी थी। इसलिये टाडा की धारा 5 के तहत भी वे दोषी नहीं हैं।
एके 56 राईफल साजिश का हिस्सा नहीं- सीबीआई ये साबित करने में नाकामियाब रही है कि संजय दत्त ने जो एके-56 राईफल अपने पास ऱखी वो हथियारों के उस जखीरे का हिस्सा थी जो दाऊद इब्राहिम और उसके साथियों ने मुंबई बमकांड की साजिश के लिये भारत भिजवाये थे। इसलिये संजय दत्त टाडा की धारा 3 (3) के तहत भी दोषी नहीं हैं।
हथियार मांगे थे, एके-56 नहीं- संजय के अपने इकबालिया बयान से पता चलता है कि उन्होने परिवार की सुरक्षा के लिये हथियार लिया था, लेकिन ये हथियार एके-56 है ये उन्हे तब ही पता चला जब उन्हे बताया गया। उन्होने एके 56 राईफल की खासतौर पर मांग नहीं की थी। साथ ही उन्होने न तो हथगोले मांगे थे और न ही उन्हें अपने पास ऱखे, जैसा कि उनपर आरोप था।
तमाम सबूतों का ब्यौरा देते हुए अदालत ने दत्त को टाडा से तो बरी कर दिया लेकिन गैरकानूनी तरीके से हथियार रखने के आरोप में 6 साल जेल की सजा सुना दी। ये सजा वे काटेंगे या नहीं ये तय करेगा सुप्रीम कोर्ट जहां टाडा कोर्ट के इस आदेश को दत्त के वकील चुनौती देंगे।फिलहाल वे पूणे के यरवदा जेल में बंद हैं।

दाऊद ही मुख्य आरोपी है मुंबई विस्फोट 93 का - टाडा कोर्ट

जीतेंद्र दीक्षित -
मुंबई बमकांड का मुकदमा चलाने वाली विशेष टाडा अदालत ने अपने फैसले में अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम को प्रमुख आरोपी पाया है। इस फैसले में कई ऐसे सबूतों और गवाहों का ब्यौरा है, जो ये खुलासा करते हैं कि दाऊद ने किस तरह से उसी मुंबई शहर को खून से सराबोर कर दिया, जहां वो पला बढा था। भारत में हुए सबसे बडे आतंकवादी हमले का जिम्मेदार पाये जाने के बावजूद दाऊद अब भी कानून की गिरफ्त से बाहर है।
दाऊद इब्राहिम कासकर का भारत का एक कुख्यात गुनहगार तो है ही, उसका नाम आज दुनिया के मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की लिस्ट में शामिल है। उसपर ये ठप्पा लगा है 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में उसकी भूमिका की वजह से। उस काली तारीख की साजिश में दाऊद का कितना हाथ था, ये दर्ज है इस विशेष टाडा अदालत के इस आदेश में, जिसकी कॉपियां अब आरोपियों को सौंपीं जा रहीं हैं
फैसले के पन्नों के पलटने के साथ ही दाऊद की काली करतूतों का ब्यौरा भी शुरू हो जाता है। टाडा अदालत ने अपने फैसले में पाया कि दाऊद इब्राहिम ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर भारत में आतंकवादी वारदात की आपराधिक साजिश रची, ताकि लोगों में दहशत पैदा हो, उनमे अलगाव हो, सांप्रदायिकता पनपने से शांति भंग हो और सरकारी तंत्र चरमरा जाये। ये साजिश दिसंबर 1992 से लेकर अप्रैल 1993 के बीच रची और अमल में लाई गई। साजिश को अंजाम देने के लिये 12 मार्च 1993 के दिन 13 बम विस्फोट कराये गये, जिनमें 257 लोगों की मौत हो गई, 713 लोग घायल हो गये और 27 करोड रूपये की संपत्ति का नुकसान हुआ। दाऊद की पूरी साजिश में भूमिका का खुलासा होता है 19 जनवरी 1993 को दुबई में हुई एक मीटिंग से। ये मीटिंग हुई थी दाऊद इब्राहिम, टाईगर मेमन और दाऊद फणसे उर्फ टकले के बीच। दाऊद टकला, टाईगर मेमन के लिये चांदी स्मगल करवाने का काम देखता था। पर चूंकि इस बार स्मगलिंग चांदी के बजाय बारूद और हथियारों की करवानी थी इसलिये टाईगर ने टकले को दाऊद इब्राहिम से मिलवाना जरूरी समझा।)
-19 जनवरी की रात दाऊद टकला एयर इंडिया के विमान से दुबई पहुंचा। उसके वीसा और टिकट का इंतजाम टाईगर मेमन ने कराया था। एयरपोर्ट पर टाईगर ही उसे रिसीव करने आया। टाईगर उसे दुबई के होटल दिल्ली दरबार ले गया और एक कमरे में उसे ठहराया।
- इसके तीसरे दिन टाईगर शाम को 7-7.30 के करीब होटल आया और दाऊद टकला को अपने साथ चलने के लिये कहा। वो उसे एक टैक्सी में दाऊद इब्राहिम के बंगले पर ले गया। टकले को बाहरी कमरे में रूकने को कहकर वो बंगले के अंदरूनी कमरे में चला गया।
- कुछ देर बाद टाईगर, दाऊद इब्राहिम के साथ टकला के पास आया। चूंकि टकले ने अखबारों में दाऊद इब्राहिम की तस्वीरें देखीं थीं इसलिये वो तुरंत उसे पहचान गया।
- इस मीटिंग में तीनों के बीच कुछ ये बातचीत हुई-
दाऊद इब्राहिम (टकले से)- तुम किसके लिये काम करते हो।
टकला- जी ..टाईगर भाई के लिये।
दाऊद इब्राहिम- क्या तुम मेरे लिये काम करोगे
टकला- काम चांदी के कितने इंगोट्स (बिस्किट) का हे
दाऊद इब्राहिम- चांदी का काम अभी बंद कर दिया है। केमिकल, बारूद और हथियार भेजना है।
(दांत पीसते हुए) अपनी बाबरी मसजिद शहीद हो गई है। उसका बदला लेना है।
(टाईगर से पूछते हुए) काम में कितना खर्चा आयेगा।
टाईगर मेमन- 9 से 10 पेटी (यानी 9-10 लाख रूपये)
दाऊद इब्राहिम (टकले से)- काम कराने के लिये तुम्हारे पास क्या इंतजाम है
टकला- जी भाई मच्छीमार ट्रालरों में अपने लोग हैं।
दाऊद इब्राहिम- ठीक है। मैं एक स्पीड बोट भेजूगा। तुम ट्रालरों का इंतजाम कर देना। खर्चे की बात टाईगर से कर लो।

इस बातचीत के बाद तीनों ने चाय पी। दाऊद अपनी मर्सीडीज कार से टाईगर के साथ टकले को दिल्ली दरबार होटल छोडने आया। अगले दिन टाईगर, टकले को दुबई हवाई अड्डे पर छोडने आया और 50 दिरहम उसके हाथ में थमाते हुए कहा कि दाऊद भाई की कही बातों का ध्यान रखे। टाडा अदालत में ये बात साबित हो गई कि टकले ने दाऊद इब्राहिम के निर्देशों पर अमल किया और मुंबई के करीब शेखडी के समुद्र तट पर आरडीएक्स और हथियारों को उतरवाने में मदद की। दाऊद टकले की बढी हुई उम्र को देखते हुए अदालत ने उसे फांसीं के बजाय उम्रकैद की सजा दी।ये तो थी मुंबई बमकांड में दाऊद की भूमिका की एक मिसाल। मुकदमें के दौरान अदालत के सामने कई और भी सबूत सामने आये, जो इस साजिश में दाऊद इब्राहिम और उसके गुर्गों की भूमिका पर से पर्दा उठाते हैं। बमकांड के 2 आरोपियों सलीम कुत्ता और इजाज पठान के इकबालिया बयानों को अदालत ने सच माना है।इन दोनो आरोपियों ने दुबई में साजिश के लिये होनेवाली मीटिंगों का ब्यौरा दिया है।)

सलीम मीरां शेख उर्फ सलीम कुत्ता के बयान के मुताबिक -
मैं जब जनवरी 1993 के आखिरी हफ्ते में दुबई में था तो एक दिन मुस्तफा मजनू मुझे जुमैरा इलाके में दाऊद इब्राहिम के घर व्हाईट हाउस ले गया। वहां मैने दाऊद, छोटा शकील, सलीम तलवार, फिरोज, इजाज पठान, हाजी अहमद को आपस में बात करते देखा। वे लोग भारत और हिंदूओं के खिलाफ, बाबरी मसजिद और मुंबई दंगों के बारे में बात कर रहे थे। मैं वहां करीब घंटे भर तक था।
दाऊद ने वहां भाषण दिया और कहा कि मुसलिमों ने हिंदुओं के हाथो काफी जुल्म सहे हैं क्योंकि दंगों में हिंदुओं के साथ पुलिस मिली हुई थी। मुसलिम महिलाओं को बेइज्जत किया गया। हमें बदला लेने के लिये तैयार रहना चाहिये। हिंदुओं को सबक सिखाने के लिये वो सभी को हथियारों की ट्रेनिग लेने के लिये पाकिस्तान भेजेगा ताकि हिंदुओं, बडे नेताओं और आला पुलिस अफसरों की हत्या की जा सके।
इसके बाद दाऊद ने मुस्तफा मजनू को सभी का पासपोर्ट लेने के लिये कहा ताकि उन्हें पाकिस्तान भेजने का इंतजाम किया जा सके, लेकिन मैने, फिरोज और कय्यूम ने ट्रेनिंग पर जाने से मना कर दिया।
दाऊद के साथ हुई इस मीटिंग के 2-3 दिन बाद आरिफ लंबू, सय्यद कुरेशी, यूसूफ बाटला, अबू बकर और शोएब बाबा ट्रेनिंग लेने के लिये पाकिस्तान रवाना हो गये। मैने उन्हे विदा करने दुबई एयरपोर्ट गया था।

इस मीटिंग से पहले दुबई में एक और मीटिंग हुई थी, जिसका ब्यौरा इजाज पठान नाम के आरोपी ने अपने इकबालिया बयान में दिया। पठान के मुताबिक – मुंबई में दंगों के बाद दुबई में मुस्तफा दोसा के घर एक मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, मुस्तफा मजनू, यासीन कमजा, हैदर, सलीम तलवार, टाइगर मेमन और याकूब मौजूद थे। मीटिंग में मुंबई दंगों पर चर्चो हो रही थी। ये तय हुआ कि दंगों का बदला लेने के लिये कुछ किया जायेगा । आगे की कार्रवाई अगली मीटिंग में तय होगी, जिसका वक्त सभी को फोन पर इत्तला किया जायेगा। टाईगर मेमन भारत में हथियार भेजने की बात कर रहा था।
इन बयानो को टाडा अदालत ने सबूत माना है और अगर कल को दाऊद की गिरफ्त में आने के बाद उसपर मुकदमा चलता है तो इनका इस्तेमाल उसके खिलाफ किया जा सकता है। अदालत ने पाया कि ये बयान दूसरे गवाहों के बयान और सबूतों से मेल खाते हैं।
इन सबूतों से मुंबई बमकांड में पाकिस्तान की भूमिका भी सामने आती है। उसी पाकिस्तान की जिसने दाऊद इब्राहिम का इस्तेमाल कर भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हमला किया और जिसपर आज भी दुनिया के एक बेहद खतरनाक इंसान को शह देने का आरोप है।

Friday 19 October 2007

अपने हीं आंतकवाद की चपेट में फंसा पाकिस्तान, धमाके में 130 से अधिक की मौत

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर हुए आत्मघाती हमले में 130 से अधिक लोगों की मौत हो गई और 600 से अधिक लोग घायल हैं ।इस घटना की भारत समेत विश्व के सभी देशों ने निंदा की। लगातार कड़ी आलोचना हो रही है। सभी भारतवासी इस घटना से दुखी हैं। भारत सरकार ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। यह हमला गुरुवार की रात 12 बजे के बाद हुई।इस हमले में बेनज़ीर भुट्टो बच गईं । बेनजीर 8 साल बाद पाकिस्तान लौटी. हमले के बाद किसने क्या कहा यह जान ले और फिर यह जानेगें कि आप यदि पड़ौसी का घर जलाओगे तो आपके घर में अपने आप हीं आग लग जायेगी।
परवेज मुशर्रफ(राष्ट्रपति पाकिस्तान) – लोकतंत्र के खिलाफ साजिश, दोषियों को छोड़ा नहीं जायेगा।
आसिफ ज़रदारी(बेनज़ीर के पति) – इस विस्फोट के लिये सरकार में शामिल कुछ लोग जिम्मेदार हैं। इसके पीछे लोकतंत्र के दुश्मन नहीं चाहते की लोकतंत्र बहाल हो।
बान की मून(संयुक्त राष्ट्र के महासचिव) – घटना की निंदा की और मृतक परिवारजनों के प्रति संवेदना प्रकट की।
अमेरिका – यह एक आंतकवादी हमला है लोकतंत्र को रोका नहीं जा सकता।
चीन – पाकिस्तान में स्थिरता की जरुरत है।
ब्रिटेन -पाकिस्तान में शांति और लोकतंत्र की बहाली के लिए जो काम करना चाहते हैं. उन सभी लोगों के साथ ब्रिटेन मिलकर काम करेगी।इनके अलावा विश्व के कई और देशों ने बेनजीर पर हुये हमले की निंदा की।
बहरहाल, पाकिस्तान पिछले 20 सालों से भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ लगातार काम करता आ रहा है। भारत में जगह जगह विस्फोट करवा कर लोगों की जान लेने वाले आंतकियों को पाकिस्तान ने ही तैयार किया। एक दो नहीं दर्जनों कैंप बनवाये पाकिस्तान के अलग अलग स्थानों पर जहां आंतकियों को प्रशिक्षण दिया गया। इतना हीं नहीं पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में भी तालीबान को बढावा देकर वहां भारी तबाही मचवायी। पड़ौस में आग लगाने के बाद अब पाकिस्तान खुद परेशान है। पश्चिम इलाके में पाकिस्तानी सैनिको पर भी वहां के आंतकी भारी पड़ रहे हैं। समय समय पर यह खबर आती है कि 10 सैनिक मारे गये तो कभी 50 मारे गये। अब तो पाकिस्तान के शहरी इलामें भी सिलसिलेवार हमले होने लगे हैं। वहां न ते आवाम सुरक्षित है और न हीं नेता। जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे। बहरहाल हम यही चाहते हैं कि पाकिस्तान में शांति बहाल हो। दुनियां के सारे मुल्क में शांति हो लेकिन पाकिस्तान और अमेरिका की सरकार ऐसा होने देगी ?

Sunday 14 October 2007

थियेटर पर आंतकवादी हमला 6 की मौत

पंजाब के लुधियाना स्थित श्रृंगार थियेटर में जबरदस्त धमाका हुआ है जिसमें मरने वालों की संख्या 5 से बढकर 6 हो गई और कई लोग घायल हैं। मरने वालों में 10 साल का एक बच्चा भी है। मौके पर पुलिस पंहुच गई है और जांच पड़ताल में लग गई है। थियेटर में लोग आठ बजे का फिल्म शॉ देखने गये थे। बम विस्फोट रात आठ बजकर चालीस मिनट पर हुई। लोग फिल्म देख रहे थे उसी समय धमाका हुआ।थियेटर में लोग फिल्म ‘जनम जनम का साथ’ देख रहे थे लेकिन धमाके ने लोगों के भ्रम को तोड दिया और कुछ लोगों को हमलोगो से सदा के लिये दूर कर दिया। धमाके मे किस बारुद का इस्तेमाल किया गया है इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है। अजमेर स्थित ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में हुये धमाके की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि लुधियाना में धमाका हो गया। इस धमाके के पीछे कौन लोग हैं कुछ भी नहीं कहा जा सकता सिर्फ कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन इतना तय है कि इस धमाके के पीछे दहशतगर्दों का ही काम है जो त्योहार के मौके पर इस तरह का धमाका करवा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि यह एक आंतकवादी हमला है।बहरहाल, मौके पर एम्बुलेंस पहुंच गई है और लोंगों को स्थानीय हॉस्पीटल में दाखिल करा दिया गया है।थियेटर खाली करा दिये गये हैं। पुलिस दस्ता थियेटर को अपने कब्जे में लेने के बाद जांच पड़ताल शुरु कर दी है। पंजाब और दिल्ली में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है।

लुधियाना में धमाका 5 की मौत

अभी अभी खबर मिली है कि पंजाब के लुधियाना स्थित श्रृंगार थियेटर में जबरदस्त धमाका हुआ है जिसमें 5 लोगों की मौत की खबर है और दर्जनों लोग घायल हैं। मरने वालों में 10 साल का एक बच्चा भी है। मौके पर पुलिस पंहुच गई है और जांच पड़ताल में लग गई है। थियेटर में लोग फिल्म देख रहे थे उसी समय धमाका हुआ। धमाके मे किसका इस्तेमाल किया गया है इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है। अजमेर स्थित ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में हुये धमाके की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि लुधियाना में धमाका हो गया। इस धमाके के पीछे कौन लोग हैं कुछ भी नहीं कहा जा सकता सिर्फ कयास ही लगाये जा सकते हैं। मौके पर एम्बुलेंस पहुंच गई है और लोंगों को स्थानीय होस्पीटल में दाखिल करा दिया गया है।थियेटर खाली कराये जा रहें है। चारो ओर अफरा तफरी का माहोल है।

अदालतें अशोभनीय टिप्पणियां न करें– सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से कहा है कि वे गवाहों या अन्य लोगों के खिलाफ अशोभनीय टिप्पणी न करें। यदि अदालत को यह लगे कि गवाह या अन्य लोगों का व्यावहार उचित नहीं है फिर भी अदालत अशोभनीय टिप्पणी न करे। न्यायमूर्ति सी के ठक्कर और सतशिवम की पीठ ने कहा कि न्यायिक टिप्पणी सटीक, शालीन और उदार होना चाहिये। दहेज हत्या मामले में एक गवाह के संबंध में पंजाब की एक अदालत द्वारा की गई टिप्पणी के संदंर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया।

Sunday 7 October 2007

सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाई

चाहे कोई व्यक्ति हो या संस्था यदि वो लक्षमण रेखा को पार करने कि कोशिश करता है तो उसका खामियजा देर सबेर भुगतना ही पड़ता है। सबसे ताज उदाहरण है सुप्रीम कोर्ट का। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि तमिलनाडु में बंद का आयोजन डीएमके नहीं कर सकती है। लेकिन बंद को भूख हड़ताल का नाम देकर डीएमके ने जबरदस्त बंद का आयोजन किया। राज्य में लगभग सारी गाड़ियां जहां की तहां की खड़ी थी। सारी दुकाने बंद थी। यह खबर मिलते ही सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट की बात राज्य सरकार नहीं मानती है इसका मतलब वहां कानून व्यवस्था ठीक नहीं है ऐसे में वहां केन्द्र सरकार राष्ट्रपति शासन लागू कर सकती है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मिलाजुला कर सुप्रीम कोर्ट को हाथ पे हाथ रख कर बैठना पड़ा। देश ने देखा कि सुप्रीम कोर्ट भी यदि भावना में आकर या प्रशासनिक लहजे में कोई फैसला दे देती है तो जरुरी नहीं कि कार्यपालिका उसकी बात माने हीं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद तमिलनाडू बंद हुआ। राष्ट्रपति शासन लागू करने के मुद्दे पर केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने सुप्रीम कोर्ट की सहाल को साफ ठुकरा दिया। इतना हीं नहीं वामपंथी दलों ने तो यहां तक कह दिया कि तमिलनाडु में बंदी या हड़ताल होगा या नहीं ये सब कुछ सुप्रीम कोर्ट के दायरे में आता ही नहीं है। यदि बंद को दौरान कोई तोड़ फोड़ होती तो एक बात समझ में आती। बातचीत में कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के प्रति आस्था जताते हुये कहा कि सुप्रीम कोर्ट हमेशा न्याय करती आई है लेकिन यहां चुक हो गई। लोग यह भी कह रहें कि गुजरात में लगातार महीनों तक दंगे होते रहे तो सुप्रीम कोर्ट ने उस समय राष्ट्रपति शासन की सलाह केन्द्र को क्यों नहीं दी। राज्य में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने का फैसला बहुत ही मुश्किल घड़ियों में लिया जाता है। यहां पर न्यापलिका और कार्यपालिका दोनों को ही एक दुसरे की भावनाओं का ख्याल रखना चाहिये । कार्यपालिका और विधायिका को बेवजह न्यायपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करनी चाहिये उसी प्रकार न्यायपालिका को भी विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।

Wednesday 3 October 2007

डीएम हत्याकांड मामले में पूर्व सांसद को फांसी

अरुण नारायण
पटना के सत्र न्यायालय ने गोपालगंज के ज़िलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या के मामले में पूर्व सांसद आनंद मोहन, अखलाख अहमद और अरुण कुमार को फाँसी की सज़ा सुनाई है. इनके अलावा अदालत ने विधायक मुन्ना शुक्ला, आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद, हरेंद्र कुमार और शशि शेखर को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है। इन लोगों पर भीड़ को उकसाने का आरोप है। भीड़ ने जिलाधिकारी कृष्णैया की पीट पीट कर हत्या कर दी थी। जब इन नेताओं को सजा सुनाई जा रही थी उस समय अदालत के बाहर इनके समर्थकों का भारी जमावडा था। हो हंगामे की आंशका थी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अदालत के फैसले पर कुछ लोगों का कहना था कि इतनी कड़ी सजा नहीं दी जानी चाहिये थी। कुछ लोगों का कहना था कि अदालत ने एकदम सही फैसला सुनाया है। एक ने कहा कि आप इसी से अनुमान लगा सकते है कि जब एक डीएम की हत्या हो सकती है तो आमलोगों की गिनती ही नहीं है। अदालत के बाहर मौजूद लोगों में से एक व्यवसायी ने कहा कि पटना के सत्र न्यायाधीश रामश्रेष्ठ राय ने सटीक कदम उठाया। यह एक ऐसा मोड़ है जहां से अपऱाध कमी आयेगी। लोग अपराध करने से पहले 10 बार सोचेगें। इसका सबसे बडा उदाहरण है फैसले सुनाने के बाद दोषी करार दिये गये लोगों के समर्थकों का शांत रहना। ये वही लोग है जो एस पी जैसे अधिकारियों पर भी सरे आम हाथ छोड़ दिया करते है। बहरहाल,विधायक मुन्ना शुक्ला के वकील सुनील कुमार ने कहा है कि जल्दी ही इस फ़ैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जाएगी। जिलाधिकारी कृष्णैया की हत्या 4 दिसंबर 1994 को मुज़फ्फ़रपुर ज़िले के खबरा गाँव के पास उग्र भीड़ ने कर दी थी.ये लोग बाहुबली और स्थानीय नेता छोटन शुक्ला की हत्या के विरोध में जुलूस निकाल रहे थे.मुन्ना शुक्ला छोटन शुक्ला का भाई है।

Monday 1 October 2007

पूर्व सांसद और विधायक जिलाधिकारी हत्याकांड में दोषी

बिहार - बाहुबली और पूर्व सांसद आंनद मोहन, उनकी पत्नी लवली आंनद, विधायक विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला, पूर्व विधायक अखलाक अहमद , शशि शेखर और अरुण कुमार सिन्हा को गोपालगंज की स्थानीय अदालत ने गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या के मामले में दोषी करार दिया है। इनलोगों पर जिलाधिकारी कृष्णैया को जान से मारने के लिये भीड़ को उकसाने का आरोप है। यह हत्या 5 दिसंबर 1994 को उस समय हुई थी जब छोटन शुक्ला की शव यात्रा के दौरान भीड़ जिलाधिकारी कृष्णैया की पीट पीट कर हत्या कर दी थी। सजा 3 अक्टूबर को सुनाई जायेगी। आंनद मोहन उस समय बिहार पीपुल्स पार्टी के नेता थे अब यह पार्टी अस्तिव में नहीं है। मुन्ना शुक्ला जनता दल यू से विधायक हैं।

Sunday 30 September 2007

हत्या हो सकती थी उप मुख्यमंत्री की

धनबाद से कुंदन सिंह
झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता और झारखंड के उप मुख्यमंत्री सुधीर महतो के काफिले पर हमले की नाकाम कोशिश की गई।श्री महतो विनोबा भावे विश्वविधालय में आयोजित एक युवा महोत्सव में भाग लेकर धनबाद से जमशेदपुर लौट रहे थे। रास्ते में पश्चिम बंगाल में पुरुलिया और बलरामपुर के बीच जैसे ही सुधीर महतो की गाड़ी पहुंची उनकी गाड़ी पंक्चर हो गई। ये पंक्चर एक प्लान के तहत बिछाई गई कील से हुई। यह मामला रात के साढे ग्यारह बजे के आसपास की है। खतरे को भांपते हुये सुरक्षा बलों ने अपराधियों से मुकबला करने के लिये पोजिशन ले ली। तब जाकर वे लोग भाग खड़े हुये जो लोग किसी घटना को अंजाम देने की मकसद से रास्ते में कीलें बिछाई थीं। अनुमान के आधार पर कहा जा रहा है कि सड़क लुटेरा गिरोह के सदस्यों ने लूट की घटना को अंजाम देने की कोशिश के तहत सड़क पर कीलें बिछाई होंगी। चर्चा यह भी है कि यह योजना सुधीर महतो की हत्या की साजिश के तहत किया गया था लेकिन इस बात के अभी तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलें है। उल्लेखनीय है कि इसी साल 4 मार्च को झामुमो नेता और सासद सुनिल महतो की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी । इस लिये इस घटना की जांच पुलिस हर तरह से कर रही है। बहरहाल रात में हीं श्री महतो को भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच जमशेदपुर पहुंचा दिया गया।

Friday 21 September 2007

तबादले करवा सकते हैं जनप्रतिनिधि

सांसदों और विधायको से अब सरकारी कर्मचारियों को अच्छे संबंध बनाकर रखने होंगें क्यों कि विधायक या सांसद की सिफिरिश पर सरकारी कर्मचारियों का तबादला हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों की शिकायतों को सामने लाना जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य है और किसा कर्मचारी के खिलाफ कोई शिकायत है तो उसका तबादला राज्य सरकार के अधिकार में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने मुजफ्फरनगर नगर पालिका परिषद के कार्यकारी अधिकारी मोहम्मद मसूद अहमद की अपील को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी।

Thursday 20 September 2007

ओसामा ने धमकी दी मुशर्रफ को

एक कहावत है कि यदि कोई किसी के लिये गढा खोदता है तो प्रकृति उसके लिये खाई का इंतजाम कर देती है। यह कहावत पाकिस्तान के लिये सटीक है। आंतकवाद को संरक्षण देने वाला देश पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के खिलाफ अलकायदा ने युद्ध का ऐलान किया है। पाकिस्तान हमेशा नकारात्मक कामों को बढवा देता रहा खास कर भारत के खिलाफ। भारत के खिलाफ पाकिस्तान ने आंतकवादियों को इतना अधिक मदद किया और कर रहा है कि भारत में आये दिन बम धमाके हो जाते हैं। दुनियां में पाकिस्तान को आंतकवादियों की राजधानी कहा जाने लगा। लेकिन आज पाकिस्तान दोराहे पर है। कहा जाने लगा है कि पाकिस्तान एक और विभाजन की और बढ रहा है। इसका संकेत खुद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्र नवाज शरीफ दे चुके है। उन्होंने यह भी कहा है कि सेना से टकराव भी संभव है। उधर आंतकवादी संगठन अलकाय़दा ने भी पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को धमकी दी है। यानि राष्ट्रपति मुशर्रफ पाकिस्तान के नेताओं के साथ साथ आंतकवादियों के निशाने पर भी हैं। वहीं मुशर्रफ को अमेरिका का समर्थन प्राप्त है। अमेरिका चाहता है कि जब तक ईरान का मामला निपट न जाये तब तक परवेज मुशर्रफ का राष्ट्रपति बने रहना बेहद जरुरी है। और साथ हीं अलकायदा से जुड़े आंतकवादियों का सफाया करते रहें। लाल मस्जिद में सैन्य कार्रवाई मामले में, अमेरिका ने मुशर्रफ की तारीफ की थी, वहीं अलकायदा ने धमकी दी।
आंतकवाद को बढावा देने वाला देश पाकिस्तान आज खुद आंतकवाद के चंगुल में है। मुशर्रफ - यदि अमेरिका का साथ देता रहा तो अलकायदा पाकिस्तान में तबाही मचाता रहेगा, ब्लुचिस्तान और पंजाब इलाके में औसामा बिन लादेन जनरल मुशर्रफ से अधिक लोकप्रिय है। और यदि अमेरिका का साथ छोड़ता है तो मुशर्रफ कितने दिनों तक अपने पद पर बने रहेंगै कहा नहीं जा सकता। ऐसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश इफ्तकार चौधरी प्रकरण और लाल मस्जिद के मामले ने पाकिस्तान को दो भागों में बांट दिया है।

Sunday 16 September 2007

पुलिस की मौजूदगी में वकील की हत्या

झारखंड के जमशेदपुर में अरविंद गुहा ने अपने ही वकील सुधान चटर्जी की हत्या कर दी। यह हत्या उसने पुलिस की मौजूदगी में की और इसमें अरविंद गुहा की पत्नी ने भी अपने पति का साथ दिया। हत्या का आरोपी अरविंद गुहा का कहना है कि संपति विवाद को लेकर उसका और उसके भाई के बीच विवाद चल रहा था और यह मामला न्यायलय में है। लेकिन मेरा वकील सुधान चटर्जी ने मुझसे गदारी कर मेरे भाई से साठगांठ कर लिया और मुझे न्यायलय में हरवा दिया।
इस घटना के बारे में कहा जा रहा है कि वकील सुधान को अरविंद पिछले एक माह से ज्यादा समय तक बंधक बना कर रखा तो इतने दिनों तक पुलिस क्या कर रही थी? ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि यदि वकील ने अपने क्लाइंट के साथ धोखा किया तो क्या यह उचित है? बहरहाल हत्या को किसी भी तरह सही नहीं कहा जा सकता। यदि सुधन को कोई शिकायत थी अपने वकील से, तो उसके खिलाफ न्यायलय में शिकायत की जा सकती थी। न्यायलय में इसके लिये भी व्यवस्था है।सही पाये जाने पर सुधान के खिलाफ न्यायलय ज़रुर कार्रवाई करती। लोगों के साथ न्याय हो इसके लिये ज़रुरी है कि वकील, पुलिस और प्रशासन सभी को न्याय संगत काम करना होगा अन्यथा इस तरह के अपराध को रोक पाना काफी मुश्किल होगा।

Thursday 13 September 2007

10 लोगों की निर्मम हत्या

बिहार राज्य के वैशाली ज़िले में ग्रामीणों ने 10 लोगों को पीट-पीटकर मार डाला। मारे गये लोगों के बारे में ग्रामिणों का कहना है कि ये लोग चोरी करने गाँव पहुँचे थे. इस मामले में पुलिस ने दो केस दर्ज किये। पहला ग्रामीणों की ओर से चोरी करने का और दूसरा केस अज्ञात लोगों के खिलाफ कथित चोरों की हत्या का। इस बारे में वहां की पुलिस अधिकारियों कहना है कि अपने जान माल की रक्षा करना गांव वालों का अधिकार है लेकिन हिंसक कार्रवाई करना गैर कानूनी है । बताया जा रहा है कि कुल 11 लोग चोरी करने पहुंचे जिसमें से 10 लोगो को मार डाला गया, एक की हालत खराब है। इस घटना पर गांव वालों का कहना है कि इलाके में चोरी की घटनायें बढ गई थीं। पुलिस कुछ नहीं कर पा रही थी। इस लिये गांव वालों ने कठोर कदम उठाये। ऐसे में सवाल यह उठता है कि गावों में लगातार चोरी की शिकायत के बाद पुलिस ने चोरी रोकने के लिये ठोस कदम क्यों नहीं उठायी ? बहरहाल घटना के पांच घंटे बाद पहुंची पुलिस। और इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।

Friday 7 September 2007

महेश भट्ट को अंडरवर्ल्ड की धमकी

फिल्म निर्माता महेश भट्ट, मुकेश भट्ट और पूजा भट्ट को डॉन रवि पुजारी ने जान से मारने की धमकी दी। भारत से बाहर रह रहे (संभवत: मलेशिया) डॉन पुजारी का कहना है कि महेश भट्ट का डी कंपनी से संबध हैं। पुजारी ने दावा किया कि महेश भट्ट पर जो हमला पिछले दिनों हुआ था उसी ने करवाया। महेश भट्ट से 10 करोड़ रुपये की मांग की गई है लेकिन इस बात कि पुष्टि पुलिस ने नहीं की है। महेश भट्ट का कहना है कि उसका कोई संबंध डी कंपनी या किसी अन्य गैंग से नहीं है। सिर्फ हमें बदनाम करने कि कोशिश की जा रही है क्यों कि मैं सामाजिक समस्याओं को प्रमुखता से उठाता हूं।
रवि पुजारी के बारे में कहा जाता है कि वो गोली बारी कर फिल्मी दुनियां के लोगो पर दशहत पैदा करने की कोशिश करता है। पुलिस का कहना है कि मुंबई में अंडरवर्ल्ड का वो दबदबा नहीं रहा जो पहले हुआ करता था।

सांसद की अय्याशी

हरियाणा के सिरसा संसदीय सीट से कांग्रेस सांसद आत्मा सिंह गिल को पुलिस ने सिरसा के एक गेस्ट हाउस से दो कॉल गर्ल के साथ रंगे हाथ पकड़ा और हिरासत में ले लिया। ये लोग पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस से हिरासत में लिये गये. पकड़े गये सांसद का कहना है कि दोनों लड़कियां कॉल गर्ल्स नहीं हैं बल्कि उनकी रिश्तेदार हैं। उन्हें रिहा भी कर दिया गया क्योंकि इस तरह के मामले में कोई केस नहीं बनता है। ये अपनी मर्जी से सेक्स का मामला है।
बहरहाल, जैसे हीं लोगो को मालूम चला कि सांसद महोदय अय्याशी करने के लिये दो लड़कियों के साथ गेस्ट हाउस पहुंचे हैं लोगों ने गेस्ट हाउस को घेर लिया। गेस्ट हाउस के रजिस्टर में सांसद गिल का नाम भी नहीं था। मालूम चला है कि वे गेस्ट हाउस में जबरदस्ती घूस आये।गेस्ट हाउस के बाहर जबरदस्त हंगामे के कारण पुलिस को भी आना पड़ा। अब यह मामला धीरे धीरे तूल पकड़ता जा रहा है। विरोध दलों ने सांसद गील से इस्तीफे की मांग की है।

Sunday 26 August 2007

हैदराबाद में धमाका 42 की मौत

आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में 25 अगस्त की शाम को हुए बम धमाकों में मरने वालों की संख्या बढ़ कर कर 42 हो गई है. धमाकों के पीछे किसी आंतकवादी संगठन का हाथ बताया जा रहा है। लेकिन इसके पीछे कोई विदेशी हाथ है या नहीं इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले है।हालांकि राज्य के गृहमंत्री के जेना रेड्डी ने इस विस्फोट के पीछे पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने की आशंका जताई है। साथ हीं जानकार बताते हैं कि हरक़तुल अल जेहादी अल इस्लामी (हूजी)और लश्करे तैयबा की उपस्थिति इस इलाक़े में रही है।
ये धमाके लुम्बिनी पार्क और गोकुल चाट भंडार में हुए। चारो ओर मातमी माहौल था। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसे माहौल में क्या करें और क्या न करें। इन दो धमाकों के कुछ हीं देर बाद दिलसुक नगर और मलकपेट के इलाक़ों में जीवित बम मिले जिससे चारो ओर हड़कंप मच गया. ये बम रात लगभग साढ़े नौ बजे फटने वाले थे। यदि ये बम विस्फोट हो जाता तो मरने वालों की तादाद काफी बढ जाती।
पुलिस का कहना है कि विस्फोटक पदार्थ नागपुर से लाए गए थे और इन्हें टाइम बम की शक्ल में रखा गया था.इस घटना के पीछे बिलाल का हाथ बताया जाता है।कुछ महीने पहले हैदराबाद के ही मक्का मस्जिद धमाके और अन्य आंतकवादी घटनाओं में भी बिलाल का नाम आता रहा है.धमाके से पहले पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया था जिसके पास से दो करोड़ से अधिक के नकली रुपये बरामद हुये। इनमें से एक सऊदी अरब का रहने वाला है।

Friday 10 August 2007

आईएसआई और दाऊद

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के कब्जे़ में है अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहीम। पुलिस और भारतीय जांच एंजेसी मानती है कि दाऊद पाकिस्तान में ही है और वहां उसे आईएसआई का संरक्षण प्राप्त है। सी बी आई के अनुसार कराची स्थित दाऊद का पत्ता है ह्वाइट हाऊस, सऊदी मस्जिद के निकट, क्लिफटन, कराची, पाकिस्तान। यह बेहद ही पॉश इलाका है।
दाऊद इब्राहीम का मुख्य अड्डा पाकिस्तान के कराची में है लेकिन वह कब कहां रहता है और कहां आता जाता है इसकी जानकारी सिर्फ आई एस आई और डी कंपनी के कुछ खास लोगों को हीं होती है। क्योंकि दाऊद की लडाई सिर्फ गैंगवार तक सीमित नहीं रही बल्कि यह मामला गैंगवार से ऊपर ऊठकर खुफिया विभागों तक पहुंच गई। दाऊद की तलाश में भारत की खुफिया एजेंसियों के अलावा अमेरिका की खुफिया एजेंसी सी आई ए और ब्रिटेन की सुरक्षा सेवा (एमआई 5) भी जुड़ी हुई है।
इस बात का खुलासा समय समय पर होता रहा लेकिन कुछ अधिक खुलासा 23 जुलाई 2005 के आसपास हुआ.। यह दिन खास है क्योंकि इस दिन दाऊद इब्राहीम की बेटी माहरुख और पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट खिलाडी़ मियांदाद के बेटे जुनैद के बीच शादी हुई। यह शादी दुबई स्थित एक फाइव स्टार हॉटल में हुई। इस शादी को लेकर दुनियां भर के तमाम सुरक्षा एजेंसियां एलर्ट थीं क्योंकि उन्हें तलाश थी डॉन दाऊद की लेकिन दाऊद उन्हें नहीं मिला।
आपराधिक गतिविधियों को लेकर भारत को दाऊद की तलाश है लेकिन अमेरिका दाऊद को आंतकवादी मानता है इसलिये वो भी दाऊद की तलाश में है। अमेरिका ने 2003 मे उसका नाम ग्लोबल आंतकवादी की सूची में डाल दिया। कहा जा रहा है कि दाऊद के संबंध अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन तक है। जहां एक ओर दुनियां की तमाम सुरक्षा एजेंसियां दाऊद की तलाश में है वहीं पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई एस आई दाऊद को सुरक्षा प्रदान कर रही है। आखिर क्यों?
जानकार बताते हैं कि दरअसल पाकिस्तान को ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो भारत के खिलाफ हर स्तर पर उसका साथ दे पर उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल नहीं रहा था। यहां तक कि 1985 में मुंबई छोड़ दुबई जा पहुंचे दाऊद पर आई एस आई की नजर लगातार बनी रही लेकिन आई एस आई दाऊद को अपने जाल में नहीं फंसा सकी लेकिन उसे मौका मिल गया 1992-93 में। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराये जाने के बाद देश में सांम्प्रदायिक उन्माद का जो माहौल बना और दंगे हुये उसका फायदा उठाया पाकिस्तान ने। वह दंगे की आग में घी डालने से कभी बाज नहीं आया। इतना ही नहीं उसने हिन्दू- मुस्लिम एकता को भी हमेशा बिखेरने की कोशिश की।
सूत्र बताते हैं कि मातमी माहौल का फायदा उठाते हुये आई एस आई ने टाइगर मेमन को ढूंढ निकाला। टाईगर का मुंबई में अच्छा खासा दबदबा था। मुख्य रूप से चांदी का तस्करी करने वाला टाइगर आई एस आई के प्रभाव में आकर मुंबई को तहस नहस करने के लिये राजी हो गया। बैठको के कई दौर चले। अंतत: यह फैसला हुआ कि दाऊद को शामिल किये बिना मुंबई धमाके की बड़ी योजना सफल नहीं हो सकती। सूत्र बताते है कि दाऊद इतना बड़ा रिस्क लेने को तैयार नहीं था क्योंकि दाऊद को मुंबई से करोड़ों की कमाई होती थी। इस मामले को लेकर दुबई में दाऊद, टाइगर और आई एस आई के बीच कई दौर की बैठकें हुई। बैठक में यह तय हुआ कि दाऊद को जो घाटा मुंबई में होगा उसकी भरपाई कराची और अन्य जगहों से कर दी जायेगी। यह भी गारंटी दी गई कि पाकिस्तान का कोई भी डॉन उसके कारोबार में दखल नहीं देगा और सुरक्षा की पूरी जिम्मेवारी आई एस आई पर होगी। इसके बाद हीं दाऊद राजी हुआ और 1993 मुंबई विस्फोट को अंजाम दिया।
विस्फोट के बाद वैसा हीं हुआ जैसा बैठक में तय हुआ था। आई एस आई ने दाऊद की हरसंभव मदद की। और दाऊद ने भी आई एस आई की मदद की। जानकार बताते है जैसे दाऊद पहले स्वतंत्र था लेकिन अब नहीं है। क्योंकि दाऊद पाकिस्तान के उन सारे हरकतों से वाकिफ है जो भारत के खिलाफ किया गया। इसलिये पाकिस्तान दाऊद को अपनी निगरानी से दूर नहीं जाने देगा।
बहरहाल स्थितियां अब बदल गई है। कहा जा रहा है कि पहले आई एस आई को जरूरत थी दाऊद की लेकिन अब नहीं है। जब तक दाऊद आई एस आई के अधिकारियों को पैसा देता रहेगा तभी तक वह सुरक्षित है।

Tuesday 7 August 2007

दाऊद और राजन के बीच गैंगवार

अंडर वर्ल्ड के दो डॉन दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन के बीच विवाद होते हीं छोटा राजन ने दाऊद से संबंध तोड़ अपना गिरोह बना लिया। शुरुवाती दौर में राजन इतना मजबूत नहीं था कि दाऊद से टकरा सके लेकिन अब छोटा राजन दाऊद को मारने की हर संभव कोशिश कर रहा है। उसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि वह दाऊद को मार गिरायेगा। मीडिया में अपने इस वचन को छोटा राजन ने फिर दोहराया।

गैंगवार में दोनो खेमों के कई लोग मारे गये । लेकिन उनकी आपसी लड़ाई इतनी बढ गई कि वे लोग एक दूसरे की हत्या करवाने के लिये हर संभव कोशिश करने लगे । वर्ष 2000 के सितंबर माह में बैंकॉक में डी कंपनी ने छोटा राजन पर जान लेवा हमला किया। इस हमले में राजन का खासमखास सहयोगी रोहित वर्मा और उसकी पत्नी मौके पर ही मारे गये। इस हमले में राजन को भी गोली लगी और उसे अस्पताल में भर्त्ति करा दिया गया। सारी गोलियां निकाल दी गई लेकिन सेहत में थोड़ी सुधार होते हीं राजन सुरक्षा गार्डों को चकमा देकर भाग निकला। कहा जाता है कि इस हमले की पूरी योजना अंडर वर्ल्ड डॉन छोटा शकील ने खुद तैयार की थी। इसमें सबसे अधिक अहम भूमिका निभाई दाऊद इब्राहीम के खासमखास शरद शेट्टी ने। शरद शेट्टी ने मुंबई स्थित होटल के मालिक और अपने दोस्त विनोद शेट्टी के माध्यम से यह पता करवा लिया कि राजन कहां है तब जाकर राजन पर हमला हो सका। इस हमले के लिये छोटा शकील ने काफी तैयारी की थी।

इसके बाद राजन ने दाऊद के निकट के सहयोगियों की हत्या करनी शुरु कर दी। विनोद शेट्टी की हत्या 2001 में कर दी गई। इसके साथ साथ सुनिल नामक व्यक्ति की भी हत्या कर दी गई। कहा जाता है कि इसने भी राजन कहां है पता लगाने में मदद की थी। लेकिन अंडर वर्ल्ड की दुनियां में उस समय तहलका मच गया जब वर्ष 2002 के जनवरी महीने में, दाऊद इब्राहीम के राइट हेंड शरद शेट्टी की दुबई स्थित इंडिया सोशल क्लब में राजन के शूटरों ने हत्या कर दी। राजन यहीं नहीं रुका – उसने दाऊद की हत्या के लिये पाकिस्तान में भी हमला करने की कोशिश की और कराची के एक मार्केट काविश क्राउन प्लाजा में धमाका कराया। कहा जाता है कि उस हॉटल का मालिक दाऊद इब्राहीम हीं है।

बहरहाल मौके की तलाश में दोनो ही खेमा लगा हुआ है। बीच में यह खबर भी उड़ी थी कि दाऊद और राजन में फिर दोस्ती हो गई है। लेकिन सच्चाई यही है कि दूश्मनी बरकरार है।

दाऊद से राजन का अलग होना

दाऊद इब्राहीम लगातार सुर्खियों में है। आज भी चर्चा रही कि दाऊद, अनीस और टाइगर मेमन को पाकिस्तान में हिरासत में ले लिया गया है और वो भी अमेरिका के दबाव में। लेकिन डी कंपनी के सबसे खास सदस्य और डॉन छोटा शकील ने इसका खंडन कर दिया। इसके बाद यह समाचार सुर्खियों से गायब हो गया। एक चर्चा यह भी थी कि दाऊद के काफिले पर हमला हुआ जिसमें दाऊद का भाई अनीस इब्राहीम जख्मी हो गया है। यह भी समाचार अफवाह निकला। यहां सवाल है कि डी कंपनी पर हमला करने की क्षमता किसमें है? बताया जाता है कि दाऊद को सबसे ज्यादा खतरा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई एस आई और वहीं के लोकल अंडरवर्ल्ड से है। इसके अलावा सबसे बड़ी चुनौती अंडरवर्ल्ड के एक और डॉन छोटा राजन से है।

छोटा राजन का असली नाम है राजन सदाशिव निखालजे। ऱाजन ने जब मुंबई के अपराध जगत में कदम रखा, उस समय मुंबई के एक इलाके में राजन नायर का दबदबा था। राजन निखालजे अपने आक्रमक तेवर के कारण अपराध जगत में तेजी से उभरा और कुछ समय तक राजन नायर के साथ काम भी किया ऐसे में गिरोह के लोगों ने राजन नायर को बड़ा राजन और राजन सदाशिव निखालजे को छोटा राजन के नाम से पुकारने लगे। बड़ा राजन की हत्या के बाद छोटा राजन ने दाऊद के खेमे में शामिल हो गया। बहरहाल अंडरवर्ल्ड की दुनियां में जो रुतबा दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन का है वैसी रुतबा पहले किसी की नहीं रही। लेकिन आज दोनो सिर्फ अलग अलग हीं नहीं बल्कि एक दूसरे की जानी दुश्मन बन चुके हैं। और जानलेवा हमले करने से भी नहीं चुकते।

दाऊद और राजन के बीच मतभेद
जानकार बताते हैं कि दोनो काफी घनिष्ठ मित्र रहे लेकिन पैसे बंटवारे को लेकर दोनो के बीच मतभेद उभरने शुरु हो गये।यह वाक्या है अस्सी दशक के अंतिम दौर का। यह मतभेद उस समय और गहरा गया जब राजन ने दाऊद को जानकारी दिये बिना हीं शिव सेना के नगर सेवक खिम बहादुर थापा को लुढका दिया। कहा जाता है कि थापा के दाऊद से अच्छे संबंध थे। और इस हत्याकांड को लेकर दाऊद राजन से काफी नाराज़ हो गया था। बहरहाल इसी बीच 6 दिसंबर 1992 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराये जाने के बाद देश भर में सांप्रदायिक दंगे हुये। इसी कड़ी में 12 मार्च 1993 को मुंबई के कई इलाकों में बम धमाके हुये और 257 लोग मारे गये। इसके लिये मुख्य रुप से दाऊद इब्राहीम और टाइगर मेमन को दोषी माना गया। यहीं से छोटा राजन ने अपने आपको दाऊद से अलग करना शुरु कर दिया। ऱाजन भी देश से बाहर था । अब वह दुबई से बाहर किसी और देश में अपना ठिकाना बनाना शुरु कर दिया। इस बीच डी कंपनी ने छोटा राजन की हत्या के लिये कोशिशे शुरु कर दी थी। जानकारों का यह भी मानना है कि राजन को डॉन अबु सलेम ने टीप्स दी थी कि वह दाऊद से सावधान रहे, वह काफी नाराज़ है। सलेम भी उस समय डी कंपनी में ही था लेकिन उसने छोट राजन को सावधान कर दिया था क्योंकि डी कंपनी में रहते हुये दोनो अच्छे मित्र बन गये थे।
दाऊद और राजन के बीच गैंगवार – अगली किस्त में ...

Monday 6 August 2007

डी कंपनी

डी कंपनी – इसका अर्थ है दाऊद की कंपनी – इसे और अधिक खुलासा किया जाय तो इसका तात्पर्य है अंडर वर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के लिये प्रति माह पैसे लेकर काम करने वाले लोग। चर्चा है कि दाऊद का गैंग एक कंपनी की तरह काम करता है. डी कंपनी का चैयरमेन खुद दाऊद इब्राहीम है और सी ई औ उसका भाई अनीस इब्राहिम। छोटा शकिल डी कंपनी का एम डी है. इसी तरह डी कंपनी के अंतर्गत सभी लोंगों को उनके रैंक और काम के अनुसार प्रति माह वेतन दिया जाता है। बताया जाता है कि कंपनी में बोनस की भी व्यवस्था है। दाऊद, अनीस और छोटा शकिल के अलावा डी कंपनी के जो मुख्य लोग हैं उनमें टाइगर मेमन, येदा याकुब, फहीम मचमच, अनवर थेबा, ताहिर टकला, जावेद चिकना और अफताब बाटकी का नाम महत्वपूर्ण बताया जाता है। सबसे पहले यह जानना होगा की डी कंपनी का क्या कारोबार है? इसके चैयरमेन, सी ई ओ और एम डी क्या करते हैं? जानकार बताते हैं कि डी कंपनी का कारोबार शुरुआती दौर में लोगों की हत्या, तस्करी और वसुली था। जैसे जैसे यह कंपनी पैसे कमाने लगी वैसे वैसे करोबार भी फैलता गया। डी कंपनी के पास इतनी ताकत है कि वह कहीं भी बम विस्फोट कर बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकता है। मुंबई में 1993 का बम धमाका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कहा जाता है कि मादक पदार्थों की तस्करी में भी डी कंपनी का कब्जा है। इसके अलावा फिल्म और रियल स्टेट में भी दाऊद के बड़े पैमाने पर पैसे लगे हए हैं। डी कंपनी के और भी कारोबार हैं।
दाऊद का नाम भारतीय उपमहाद्वीप और अरब देशों में पहले से था लेकिन अमेरिका द्वारा दाऊद का नाम ग्लोबल आंतकवादी की सूची में डालते हीं सारी दुनिया दाऊद के नाम से परिचित हो गई। लोग दाऊद के बारे में अधिक से अधिक जानने की कोशिश करने लगे। सूत्रों का कहना है कि दाऊद को इन दिनों पहचानना बेहद मुश्किल है उसके एक नहीं कई नाम और कई पहचान हैं। अलग अलग देशों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। कहा जाता है कि आयात और निर्यात के कारोबार के अलावा दुनियां के कई देशों में वहां के नेताओं से संबंध बनाने की जिम्मेदारी खुद दाऊद इब्राहीम के जिम्मे है। कंपनी के फाईनेंस का पूरा कारोबार अनीस इब्राहिम खुद देखता है इसमें कहां से कितना पैसा आना और किसे कितना देना है सब कुछ शामिल है। कंपनी के एम डी (प्रबंध निदेशक) छोटा शकील के पास दूसरे गैंग पर हमला और किसे लुढकाना है, इसकी जिम्मेवारी है। इतना हीं नहीं कंपनी में नये शूटरों की भर्त्ति की जिम्मदारी भी छोटा शकील की है।
बहरहाल डी कंपनी के पास कितना धन है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक डी कंपनी के पास लगभग 20 हजार करोड़ का धन होगा। कहा जाता है कि सिर्फ भारत में खासकर महाराष्ट्र और गुजरात में डी कंपनी में काम करने वालों की संख्या लगभग 2000 है। देश और विदेश में कितने लोग डी कंपनी में होंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।