Friday 28 December 2007

आंतकवाद के लिए अमेरिका और पाकिस्तान दोषी

अफगानिस्तान के बाद अमेरिका रासायनिक हथियार और अलकायदा को मदद करने के नाम पर इराक को तबाह कर दिया और राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी। जो आरोप लगाये गये सद्दाम पर, उन्हें अमेरिका सिद्ध नहीं कर पाया। ऊपर से युद्ध मे हो रहे खर्च इराक के तेल कुएं से तेल बेच कर पूरे किये जा रहे हैं। इतने जघन्य अपराध के लिए अमेरिका को बोलने वाला कोई नहीं। इसका मुख्य कारण है कि अमेरिका विश्व की एकमात्र सुपर पावर रह गया है। इसके अलावा कोल्ड वार के दौरान इराक अमेरिका के साथ रहा, इसलिए अमेरिका-विरोधी कोई देश खुलकर नहीं बोल पाया। ईरान को भी अमेरिका मारने की पूरी तैयारी कर ली है लेकिन कोल्ड वार के दौरान ईरान रूस के साथ था। इसलिए ईरान के खिलाफ युद्ध की भूमिका बना रहे अमेरिका को उस समय तगड़ा झटका लगा जब अमेरिका की ओर से प्रतिदिन हो रहे धमकी भरी बयानबाजी के दौरान रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने ईरान का दौरा किया और सुरक्षा संबंधी समझौता किया। अब अमेरिका ईरान के खिलाफ संभल कर बयान दे रहा है।

अमेरिका अपने मित्र देश रहे इराक को खत्म कर दिया। अब बारी है पाकिस्तान की। पाकिस्तान को आज तक भरपूर मदद कर रहा है अमेरिका, लेकिन अब उस पर कड़ी नजर रख रहा है क्योंकि पाकिस्तान आंतकवादियों के लिए अफगानिस्तान से अधिक सुरक्षित जगह है। अमेरिकी सैनिक आज तक अफगानिस्तान में है, लेकिन उनकी तैनाती पाकिस्तान में इस वक्त संभव नहीं। ऐसे में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सीमावर्ती इलाके के दुर्गम क्षेत्रों मे रहे रहे अलकायदा के सरगना को पकड़ना कोई आसान काम नहीं है। क्योंकि पाकिस्तानी सैनिक जहां अमेरिका के रहमोकरम पर है वहीं पाकिस्तानी जनता अब अमेरिका के खिलाफ है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इसका फायदा अवाम के बजाय आतंकवादी संगठन उठा रहे हैं।

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि आंतकवादियों ने पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को ही उड़ा दिया। बताया जा रहा है कि बेनजीर की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह अमेरिकी समर्थक थी। इससे अंदाजा लगा सकते है कि परमाणु संपन्न देश पाकिस्तान में अलकायदा और अन्य आतंकवादी संगठन कितनी गहरी पैठ बना चुका है। जिस आतंकवाद को पाकिस्तान ने पाला पोसा और जगह दी, आज वही उसे निगल रहा है। ये तो होना ही था। आज बेनजीर जैसी बढिया नेता मारी गई, कल कोई और मारा जायेगा। वहां के शासक ने आंतकवाद का जो बीज बोया है उसकी कीमत अब वहां की आवाम को भी चुकानी पड़ रहा है। हालात गंभीर हैं।

स्थिति को देखते हुए अमेरिका परमाणु संपन्न पाकिस्तान को खुला छोड़ने को तैयार नहीं और वहां की अवाम और आंतकवादी अमेरिका को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। ऐसे में पाकिस्तान गृह युद्ध की और बढ जाए तो गलत नहीं होगा। अनुमान यह भी लगाया जा रहा है हालात को देखते हुए कि यदि भविष्य में पाकिस्तान का एक और विभाजन हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

पाकिस्तान में नहीं रुकेगा हत्याओं का सिलसिला

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या से दुनियां में सनसनी फैल गई। उन्हें आज लरकाना में दफना दिया गया। लेकिन यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है क्योंकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और पाकिस्तान के एक और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आंतकवादियों के निशाने पर हैं। इन लोगों पर भी जानलेवा हमला हो चुका है। पूरा पाकिस्तान हीं आंतकवादियों की चपेट में है। इसका खामियाजा पूरी दुनियां को झेलना पड़ेगा।

अब सवाल यह है कि आंतकवाद के लिये क्या सिर्फ पाकिस्तान ही दोषी है? नहीं, इसके लिये पाकिस्तान के अलावा और कोई दोषी है तो वह है अमेरिका। अमेरिका पूरी दुनियां में अपनी पकड़ बनाने की मकसद से हमेशा भारत को परेशान करने के लिये पाकिस्तान को आर्थिक मदद देता रहा। ऱुस और भारत के अलावा चीन ही ऐसा देश है जो अमेरिका की दादागीरी को रोक सकता था इसके लिये अमेरिका को दक्षिण एशिया में एक ऐसे देश की जरुरत थी जहां अमेरिका अपनी दखल रख सके। ऐसे में अमेरिका को पाकिस्तान से अधिक और कोई बेहतर देश नहीं मिल सकता था। क्योकिं अमरीका सैनिक दृष्टि कोण के हिसाब से पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण जगहों पर बसा है।

दक्षिण एशिया स्थित पाकिस्तान की सीमा मध्य पूर्व और मध्य एशिया से मिलता है। इसके दक्षिण में अरब सागर है तो सुदूर उत्तर में इसकी सीमा चीन से मिलती है उसी प्रकार पूर्व में सीमा रेखा भारत से लगी है तो पश्चिम में ईरान और अफगानिस्तान से। पाकिस्तान की आर्थिक हालत खराब है, इसका फायदा उठाते हुये अमेरिका ने पाकिस्तान को यह जानते हुये जबरदस्त आर्थिक मदद करता रहा कि पाकिस्तान आर्थिक मदद में मिले पैसे का इस्तेमाल में देश के विकास में न कर भारत के खिलाफ कर रहा है - चाहे युद्ध की तैयारी में पैसा खर्च कर रहा है या आंतकवादियों को बढावा देने में।

इधर कश्मीर में तबाही के लिए पाकिस्तान की हरकतों को नजरअंदाज करने के साथ साथ अप्रत्य़क्ष मदद करता रहा और उधर रूस को तबाह करने के लिए अफगानिस्तान में खुलेआम अलकायदा के आंतकवादियों को धन और आधुनिक हथियार मुहैया कराता रहा। अफगानिस्तान और पाकिस्तान आंतकवादियों का गढ बन चुका चुका है और अब वहां के आंतकवादी इन देशों में समानांतर सरकारें चला रहे हैं। एक कहावत है कि पाप का घड़ा एक दिन फूटता जरूर है। या इसे इस प्रकार कह सकते है कि यदि बारूद बोओगे तो मौत ही मिलेगी, जीवन नहीं।

अमेरिका के रुख में बदलाव आना शुरू हुआ 11 सितंबर 2001 के बाद, जब अमेरिका में इसी दिन अलकायदा ने हमला कर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो बहुमंजिली इमारत को उड़ा दिया। ऐसा आंतकवादी हमला इससे पहले कभी नहीं देखा गया। सैकड़ो लोग मारे गये। पहली बार अमेरिका को एहसास हुआ कि आंतकवाद क्या होता है। इसी बहाने अमेरिका मुस्लिम दुनिया पर आक्रमण करने की आक्रामक नीति अपना ली। जिस अफगानिस्तान में अमेरिका ने आंतकवाद को पाला पोसा, साथ ही धन और हथियार मुहैया कराया, उसी अफगानिस्तान में अमेरिका ने इतनी बमबारी की कि लगा जैसे वो विश्व युद्ध लड़ रहा हो। फिर अमेरिका करोड़ों डॉलर खर्च करने के बावजूद अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को नहीं पकड सका या जान बूझकर पकडना नहीं चाहता क्योंकि लगता यही है कि अमेरिका ओसामा के नाम पर उन सभी ताकतवर मुस्लिम देशों को समाप्त कर देना चाहता है जिससे उसे या उसके स्वाभाविक मित्र देशों (स्वाभाविक मित्र मंडली में पाकिस्तान नहीं आता है, पाकिस्तान को सिर्फ अमेरिका अपना काम निकालने में मदद करने वाला मित्र मानता है) को खतरा है।

कोल्ड वार खत्म होने के बाद अमेरिका ने जैसे ही आंतकवादी संगठन को मुहैया कराने वाली धन में भारी कटौती कर दी, वैसे-वैसे अमेरिका और अलकायदा के बीच मतभेद उभरने लगे। बहरहाल, कहा जाता है कि अमेरिका उसे जरूर मारता है जो उसका मित्र है लेकिन स्वाभाविक मित्र नहीं है। स्वाभाविक मित्र मंडली मे यूरोप के कई देशों के अलावा इजरायल है और मित्र में पाकिस्तान और इराक जैसे देश जिनका सिर्फ इस्तेमाल किया जाता है। कोल्ड वार के समय इराक अमेरिकी खेमे मे था इसलिए उसे मालूम था कि इराक के पास कितनी ताकत है। अमेरिका उभर रहे मुस्लिम देश को इस स्थिति में नहीं पहुंचने देना चाहता जो अमेरिका या उसके स्वाभाविक मित्र को भविष्य में खतरा पहुंचा सकता है। ऐसे देशों में इराक, ईरान, सीरिया और पाकिस्तान है। पाकिस्तान परमाणु बम संपन्न है। इसकी हालत और बुरी होने वाली है, इस पर आगे चर्चा करेंगे। (जारी...)

Thursday 27 December 2007

आंतकवादी हमले में बेनजीर की मौत ...

पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता बेनज़ीर भुट्टो की एक आंतकवादी हमले में मौत हो गई है. रावलपिंडी में आयोजित बेनजीर की एक रैली में ये आत्मघाती हमला हुआ है जिसमें कम से कम 50 लोग मारे गए हैं और अनेक घायल हुए हैं। इसी हमले में बेनजीर को भी विस्फोट के छरे लगे और इसके बाद उनपर गोलियां भी चलाई गई जो उनके गर्दन में लगी।विस्फोट के छरे और गोली लगने से घायल बेनजीर को पहले हॉस्पीटल ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई।शाम को 6:16 बजे भुट्टो की मौत हो गई। बेनज़ीर आठ जनवरी को होने वाले चुनाव के लिए प्रचार कर रही थीं ।वे कई वर्षों की राजनीतिक निर्वासन के बाद इसी साल के अक्तूबर में ही स्वदेश लौटी थीं। अक्तूबर में वापसी के बाद कराची में बेनज़ीर भुट्टो की एक विशाल रैली में भी भीषण बम विस्फोट हुए थे जिसमें लगभग 125 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी और अनेक घायल हुए थे। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के समर्थकों की एक रैली में भी गोलीबारी हुई है जिसमें कम से कम चार लोग मारे गए और तीन अन्य घायल हो गए. उस रैली में नवाज़ शरीफ़ नहीं थे। नवाज़ शरीफ़ ने बेनजीर की हत्या के लिये राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को ज़िम्मेदार ठहराया है.
जीवन का सफ़र -बेनज़ीर भुट्टो का जन्म 1953 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत हुआ था. इनका परिवार पाकिस्तान का सबसे मशहूर राजनीतिक परिवार रहा है. बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सत्तर के दशक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे. इनके पिता को फांसी दे दी थी वहां की सैन्य सरकार ने। बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का तख़्तापलट जनरल ज़िया उल हक़ ने 1977 में किया था और गिरफ़्तारी के दो साल बाद भुट्टो को फांसी दे दी गई थी ।बहरहाल बेनज़ीर ने उच्च शिक्षा प्राप्त की अमरीका के हार्वर्ड और ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालयों से। बेनज़ीर दृढ़ निश्चय वाली महिला थी। उनके पिता को फांसी दिए जाने से कुछ समय पहले बेनज़ीर को गिरफ़्तार किया गया और उन्हें पांच साल तक जेल में बिताने पड़े थे.उन्होने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) का गठन की थी लंदन में उस समय जब इलाज के लिये जेल से बाहर आया जाया करती थी। इस पार्टी के बैनर तले उन्होने जनरल जिया के खिलाफ आंदोलन शुरु की थी। लंदन से 1986 में पाकिस्तान से वापस आ गई थी। 1988 में एक विमान में हुए बम धमाके में ज़िया उल हक की मौत के बाद वो पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. बेनज़ीर भुटुटो दो बार प्रधानमंत्री बनी 1988-90 और 1993-96 में। उनके पति आसिफ़ ज़रदारी की प्रशासन में अहम भूमिका रहती थी. इस कारण उन्हें कई बार कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा। दोनो पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हालांकि उनके खिलाफ कोई भी आरोप सिद्द नहीं हो पाया। लेकिन जरदारी को 10 साल जेल में बिताने पड़े। वे 2004 मे रिहा हूये। पाकिस्तान सरकार के साथ हुए हाल के समझौते के तहत बेनज़ीर को कई मामलों में आममाफ़ी दे दी गई थी. बेनजीर पाक प्रशासन से परेशान हो कर 1999 में पाकिस्तान छोड़कर दुबई चली गई थी जहां वे अपने पति और तीन बच्चों के साथ रह रही थी। उनका भाई मुर्तजा पिता को फ़ांसी दिए जाने के बाद वह अफ़गानिस्तान चले गए थे. इसके बाद कई देशों मे रहे और उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य शासन के खिलाफ़ अल-ज़ुल्फ़िकार नाम का चरमपंथी संगठन बनाकर अपना अभियान चलाया करते थे लेकिन उनकी भी पाकिस्तान लौटने पर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। बेनज़ीर के दूसरे भाई शाहनवाज़ भी 1985 में अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे. बहरहाल बेनज़ीर भुट्टो लगभग आठ साल बाद इस साल 18 अक्तूबर को पाकिस्तान वापस आई थीं. लेकिन बेनज़ीर भुट्टो के स्वदेश लौटने के बाद कराची में उनके काफ़िले में दो बम धमाके हुए जिनमें 125 लोग मारे गए हैं और लगभग 300 लोग घायल हुए हैं. उस हमले में बेनज़ीर बाल-बाल बच गई थीं।

पाकिस्तान को डर है कि दाउद भारत में सरेंडर कर सकता है

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को डर है कि कहीं अंडरवर्लड डॉन दाउद इब्राहिम उसे छोड कर खुद को भारत के हवाले न कर दे। दाऊद के सरेंडर के डर से आईएसआई ने उसके परिवार समेत पाकिस्तान से बाहर जाने पर रोक लगा दी है।इसी रोक की वजह से दाऊद हाल ही में अपने एक खास साथी की बेटी के निकाह में अपने परिवारवालों को नहीं ले जा सका। ये दाऊद का वो साथी है, जिसे उसका दाहिना हाथ माना जाता है और डी कंपनी का काला कारोबार उसी की देखरेख में चलता है। ओमान- खाडी का एक देश। ये वो जगह है जहां हाल ही में एक जश्न आयोजित किया गया था। ये मौका था डी कंपनी के एक खास शूटर की बेटी की निकाह का। ये शूटर अंडरवर्लड में दाऊद का दाहिना हाथ माना जाता है और वो चाहता था कि बॉस अपने पूरे परिवार के साथ शादी में शरीक हों, लेकिन आईएसआई ने उसकी मंशा पर पानी फेर दिया।
आईएसआई ने दाउद को तो इस कार्यक्रम मे हिस्सा लेने के लिए जाने तो दिया लेकिन उसके परिवार और डी कंपनी के बाकी सदस्यों को पाकिस्तान में ही बंधक बनाए रखा. यानी जब तक दाउद पाकिसातान नहीं लौटा, उसके लोगों को पाकिसातान से बाहर नहीं जाने दिया गया।दरअसल जिस छतरी के नीचे दाऊद इह्राहिम ने पनाह ली, अब वही उसके लिये कैदखाना बन गया है। दाऊद इब्राहिम के परिवार का कोई सदस्य अगर पाकिस्तान से बाहर है, तो दाऊद पाकिस्तान छोड कर बाहर नहीं जा सकता और अगर दाऊद खुद पाकिस्तान से बाहर जाता है तो उसके कुनबे को पाकिस्तान छोडने की इजाजत नहीं है। जी हां, जिस अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम से मुंबई खौफ खाती है और तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां जिसे अपनी गिरफ्त में लेने को बेताब हैं, उस दाउद इब्राहिम पर ये बंदिशें लगाईं हैं उसे पनाह देने वाली पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई ने। डॉन की यही मजबूरी ओमान में निकाह के इस मौके पर सामने आई।
दाऊद के लिये इस शादी में सपरिवार शामिल होना काफी अहमियत रखता था। अंडरवर्लड में माना जाता है कि दाऊद की सल्तनत खडी करने में इस शूटर ने अहम भूमिका निभाई। अब भी दाऊद का काला कारोबार उसी की देखरेख में चलता है।पर आईएसआई की ओर से लगाई गई बंदिशों की वजह से दाऊद उसकी बेटी की शादी में अपने परिवार के बाकी सदस्यों को नहीं ले जा सका। दरअसल 2001 तक दाऊद दुबई में ही रहता था। पर 2001 में world trade centre पर हुए आतंकवादी हमले के बाद दुनियाभर में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने आतंकवाद के खिलाफ दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस वक्त तक दाऊद भी एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया जा चुका था, क्योंकि 12 मार्च 1993 को हुए मुंबई बमकांड में उसकी भूमिका की बात भारत ने दुनिया को बता दी थी। दाऊद दुबई में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा और उसने पाकिसातानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से मदद की गुहार लगाई। आईएसआई के लिये भी दाऊद को बचाना जरूरी था क्योंकि दाऊद न केवल आईएसआई का राजदार था, बल्कि भारत में आतंकवादी गतिविधियां चलाने के लिये उसका एक अहम प्यादा भी। इसलिये आईएसआई ने उसे कराची में पनाह दे दी...पर अब आईएसआई चिंतित है। उसे लग रहा है कि दाऊद खुद को कहीं भारत सरकार के सामने सरेंडर करके उसके काले कारनामों की पोल न खोल दे।ऐसी हालत में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पाकिस्तान की बडी फजीहत होगी। दाऊद अबसे चंद साल पहले भारत के मशहूर वकील राम जेठमलानी को फोन करके कुछ शर्तों के साथ सरेंडर करने की पेशकश कर चुका है। उसका एक भाई इकबाल कासकर भी अब भारत में है और मुंबई पुलिस कासकर को अदालत में दोषी नहीं साबित कर पाई। ये सारी बातें इशारा करतीं हैं कि दाऊद अब वापस भारत लौटना चाहता है।
सवाल ये खडा होता है की दाउद और आईएसआई के बीच के अनबन की ये शुरुवात है या डर. लेकिन एक बात तो साफ है की अब डाँन के लिए पाकिस्तान मे भी सबकुछ ठीक ठाक नही है।

Tuesday 25 December 2007

मोदी विजयी कांग्रेस-भाजपा सहित हिन्दू संगठन चारो खाने चित

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात विधान सभा चुनाव में शानदार वापसी कर एक इतिहास रच दिया है। ये इतिहास इसलिये नहीं है कि भाजपा की पुन: एक बार फिर सत्ता में वापसी हुई है। इतिहास इसलिये है कि हिन्दुत्व की राजनीति में पहली बार एक व्यक्ति हिन्दू संगठनों पर भारी पड़ा। इस चुनाव में भाजपा के वरिष्ट नेता लाल कृष्ण आडवाणी को छोड़ कर किसी ने भी नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चुनाव प्रचार नहीं किया। यहां तक भाजपा के सबसे बडे नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी मौन रहे। जब समाचारो में यह बात आने लगी कि श्री वाजपेयी हिमाचल में भाजपा को जीताने की अपील कर रहे हैं लेकिन गुजरात में नहीं तब जाकर श्री वाजपेयी गुजरात विधान सभा चुनाव के दूसरे चरण से पहले एक लाइन का यह मैसेज दिया कि भाजपा को वोट करें। वास्तव में नरेन्द्र मोदी ने लाल कृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली को छोड कर अन्य किसी भी नेता को महत्व हीं नही दिया चाहे वे श्री वाजपेयी हों या भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह। इतना हीं नहीं विश्व हिन्दू परिषद और संघ का एक बडा धड़ा मोदी विरोधी रहा। गुजरात भाजपा के नेता तो मोदी के खिलाफ ही प्रचार कर रहे थे बावजूद मोदी ने अपने ही घर के राजनीतिक दुश्मनों के साथ कॉग्रेस को हरा दिया। ये शुद्ध रुप से मोदी की जीत है। अब भाजपा की मजबूरी है कि मोदी की जीत को भाजपा की जीत बताये। इतनी बडी जीत के बाद भी भाजपा नेताओं के चेहरे पर वो खुशी नहीं दिख रही है जो पहले दिखा करता था।
चुनाव परिणाम आने के बाद आकलन शुऱु हो गया कि आखिर क्या वजह है कि नरेन्द्र मोदी को शानदार सफलता मिली। इस पर आगे चर्चा करेंगे उससे पहले जो सवाल पैदा हो रहे थे कि नरेन्द्र मोदी जीत भी सकते और हार भी सकते है उसके कारण क्या थे – 1. भाजपा की एकता तार तार हो चुकी थी. गुजरात के प्रमुख भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री केशू भाई पटेल समेत दर्जनों नेता मोदी के खिलाफ प्रचार कर रहे थे। 2.आडवाणी को छोड़ भाजपा के सारे वरिष्ठ नेताओं को चुनाव प्रचार के मुख्य धारा से बाहर ऱखा गया।यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता को भी महत्व नहीं दिया गया।.3. संघ और विश्व हिन्दू परिषद का मोदी के समर्थन करने के वजाय मौन रहना 4. गुजरात दंगे के लिये दुनियां भर में निंदा .5. इस बार कॉग्रेस और एनसीपी का मिलकर चुनाव लड़ना। 6.लगातार सत्ता में बने रहने से विरोध लहर की उम्मीद 7.चुनावी प्रचार के समय सीडी का जारी होना जिसमे गुजरात दंगे के लिये मोदी को साफ तौर पर दंगा संरक्षक दिखाया गया. आदि.

इतने के बावजूद नरेन्द्र मोदी चुनाव क्यों जीते? आम तौर पर यही कहा जाता है कि 1. नरेन्द्र मोदी ने राज्य में विकास का काम किया है और 2.चुनाव प्रचार में आक्रमक नीति अपनाई। विकास मुद्दा होता तो उनके आधा दर्जन मंत्री चुनाव नहीं हारते। सिर्फ इतने से कोई चुनाव नहीं जीत सकता । गुजरात दौरे पर गये पत्रकार, विभिन्न दलो के राजनीतिज्ञ और कुछ सामजिक लोगों से बातचीत करने के बाद जो निष्कर्ष निकाले गये उससे यही लगता है कि नरेन्द्र मोदी का जीतना तय था। जिसे लोग समझने में भूल कर बैठे। मोदी ने प्रचार के लिये ठेठ गवई , आक्रमक और लालू यादव की प्रचार शैली को अपनाया। मोदी जहां भी गये वे अपने भाषण के दौरान लोगों को अपने पक्ष में मतदान करने के लिये समझाते रहे नीतिगत भाषण के अलावा। जैसे – प्र. आप किसको जीतना चाहते हैं उ. आपको आपको ... मुझे जिताने के लिये सिर्फ नारे लगाने से काम नहीं चलेगा। आपको मन मजबूत कर बूथ पर जाना होगा थोडा़ कष्ट सहकर लाइन में लगकर वोट करना होगा। वोट अब इलेक्ट्रोनिक मशीन से होता है इसलिये सावधानी से देखना होगा और जहां कमल का निशान होगा वहां बटन दबायेंगे तभी आपका मोदी भाई मुख्यमंत्री बनेगा। ये सारी बाते नरेन्द्र मोदी गुजराती में अपने समर्थकों से अपील करते रहे। यह पहला मौका था कि जब वर्ण व्यवस्था के तहत समाज के कमजोर वर्ग के लोगों ने मोदी ( भाजपा को नहीं) को जबरदस्त वोट किया। सूरत के कौशल नारायण राणा जो पिछड़े वर्ग से है। इसका कहना है कि मैं पूरी तरह हिन्दू मुस्लिम दंगों के खिलाफ हूं। गुजरात में जो दंगे हुये मैं इसका बिल्कुल समर्थन नहीं करता। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मैंने भी काम किया। मैं कमल पर मुहर कभी नहीं लगा सकता था लेकिन जैसे ही मुझे मालूम चला कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सारे लोग हैं चाहे अटल बिहारी वाजपेयी हों या राजनाथ सिंह या विश्व हिन्दू परिषद या संघ। वो भी इसलिये कि वे नहीं चाहते थे कि पिछड़े वर्ग का कोई नेता भाजपा के शीर्ष कमांड संभालने की स्थिति में हो। जैसा कल्याण सिंह के साथ श्री वाजपेयी ने किया। उन्होने श्री सिंह को न सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से रोका बल्कि ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि उन्हे पार्टी से निकलने पर मजबूर कर दिया। इस लिये मैंने मोदी को वोट किया। मोदी की जीत में एक बड़ा कारण मोदी का पिछड़े वर्ग का होना भी माना जा रहा है। पिछड़े वर्ग ने मोदी के समर्थन में गोलबंद होकर वोट किया।बहरहाल मोदी ने भले हीं चुनाव जीत लिया हो लेकिन गुजरात में जो निर्दोंष लोगों की हत्या हुई उसके लिये मोदी ही जिम्मेवार हैं। सोहराबुद्दीन एनकांउटर को लेकर जो खेल नरेन्द्र मोदी ने खेला वह कतई उचित नहीं। सोहराबुद्दीन अपराधी था उसे पुलिस ने मार गिराया एक हद मान लिया जाये कि यह सही है लेकिन उसकी पत्नी का क्या कसूर था। गवाह प्रजापति का क्या कसुर था कि उन्हे क्यों मार गिराया गया?

Tuesday 18 December 2007

प्रवीण महाजन को उम्र कैद की सजा

बीजेपी नेता प्रमोद महाजन की हत्या के जुर्म में मुंबई सेशंस कोर्ट ने उन्ही के भाई प्रवीण महाजन को उम्रकैद की सजा और कुल 20 हजार की जुर्माना सुनाई है। अदालत ने कल ही उन्हें इस मामले में दोषी घोषित किया था। सजा सुनाये जाने से पहले बचाव पक्ष और मुंबई पुलिस के वकीलों के बीच कडी बहस हुई। प्रवीण महाजन को जब सेशंस कोर्ट के जज श्रीहरि डावरे ने जब उम्रकैद की सजा सुनाई तो उनके चेहरे पर न तो कोई दुख था और न ही कोई घबराहट। मानो इस सजा के लिये वे पहले से ही तैयार थे। सोमवार को ही अदालत ने उन्हें बीजेपी नेता प्रमोद महाजन की हत्या का दोषी करार दिया था। सजा सुनाये जाते वक्त अदालत में खचाखच भीड थी। पत्रकारों, पुलिसकर्मियों के अलावा अदालत में प्रवीण महाजन की पत्नी सारंगी भी मौजूद थीं। प्रवीण को उम्रकैद की सजा सुनाये जाते ही वो रोने लगीं। वहां आये प्रवीण के बाकी रिश्तेदारों ने उन्हें संभाला। प्रवीण महाजन को धारा 302 और धारा 449 के तहत उम्र कैद और कुल 20,000 का जुर्माना सुनाया गया है। अदालती कार्रवाई की शुरूवात मुंबई पुलिस के वकील उज्जवल निकम और बचाव पक्ष के वकीलों के बीच गर्मागर्म बहस से हुई। मुंबई पुलिस ने अदालत से कहा कि प्रवीण महाजन ने जो अपराध किया है, उसके लिये फांसीं से कम सजा नहीं दी जा सकती। प्रमोद महाजन एक बडे कद के नेता थे और प्रवीण ने सुनियोजित ढंग से उनकी हत्या की। ये बात अदालत में साबित हो चुकी है, इसलिये सजा सुनाये जाते वक्त कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिये।
अदालत में ये बात साबित हो चुकी है कि 22 अप्रैल 2006 को प्रवीण महाजन ने अपने भाई प्रमोद के वर्ली इलाके के फ्लैट में जाकर उनपर गोलियां बरसाईं। इसके बाद उसने खुद को वर्ली पुलिस थाने में सरेंडर कर दिया। 13 दिनों तक मौत से जूझने के बाद आखिरकार प्रमोद महाजन ने दम तोड दिया। इस मामले में मुंबई पुलिस ने मुकदमें के दौरान कुल 34 गवाहों को अदालत के सामने पेश किया, जिसमें प्रमोद महाजन की पत्नी रेखा और नौकर महेश वानखेड़े भी शामिल थे, ये दोनों लोग वारदात के वक्त प्रमोद महाजन के फ्लैट में मौजूद थे, इन दोनों गवाहों के साथ ही उस इंसपेक्टर ने भी गवाही दी जिसके सामने प्रवीण ने खुद को सरेंडर किया था। हालांकि पुलिस का केस काफी मजबूत था लेकिन बचाव पक्ष ने भी इस बात की पूरी कोशिश की, कि प्रवीण महाजन को फांसीं की सजा न मिले। सजा में नरमी बरतने की मांग करते हुए बचाव पक्ष के वकील ने जज से कहा कि प्रवीण के 3 आश्रित हैं। पत्नी सारंगी के अलावा उनके 2 बच्चे हैं। प्रवीण ही अपने परिवार के लिये रोजी रोटी जुटाने का आधार हैं। उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। इसलिये उन्हें फांसीं न दी जाये। अदालत ने प्रवीण महाजन को Indian Penal Code की धारा 302 और 449 के तहत दोषी करार दिया है। इसका मतलब है कि अदालत ने ये माना कि प्रवीण 22 अप्रैल की सुबह प्रमोद महाजन की हत्या के इरादे से ही उनके घर में घुसे थे। धारा 302 के तहत अधिकतम सजा फांसीं की है और धारा 449 के तहत 10 साल कैद-ए-बामशक्कत।
प्रवीण महाजन को फांसीं की सजा दिये जाने की मांग पर अदालत के सामने ये सवाल खडा हुआ कि क्या उसका किया हुआ जुर्म rarest of rare crime के दर्जे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेशों में इस बात पर जोर दिया है कि फांसीं की सजा उन्ही गुनहगारों को दी जानी चाहिये, जिन्होने इतने गंभीर अपराध किये हों, जो आम तौर पर नहीं होते। प्रवीण महाजन के मामले में भी अदालत को ये देखना था कि क्या उनका जुर्म rarest of rare crime की परिभाषा के दायरे में आता है। कोर्ट ने कहा नहीं ये मामला rarest of rare crime की परिभाषा के दायरे में नहीं आता है।
प्रवीण महाजन ये कानूनी लडाई हार चुके हैं, लेकिन सेशंस कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ वे बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। आर्डर की कॉपी हाथ लगते ही उनके वकील हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

Tuesday 11 December 2007

न्यायाधीशों को सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए - सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर को कहा कि न्यायपालिका को अपनी सीमा नहीं लाँघनी चाहिए और न्यायाधीशों को सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और न हीं राजाओं की तरह व्यवहार करनी चाहिये। न्यायमूर्ति ए के माथुर और न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की पीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक फैसले को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। फैसले में हरियाणा सरकार को ट्रैक्टर ड्राईवर के पद सृजित करके प्रतिवादी चंद्रहास और अन्य को नियमित करने को कहा गया था। उन्होंने कहा है कि न्यायाधीशों को अपनी सीमाएँ समझनी चाहिए और सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को विनम्रता से काम लेना चाहिए। दोनो न्यायधीशों नेन्यायमूर्ति माथुर और न्यायधीशों ने नीतिगत मामलों में भी न्यायपालिका के हस्तक्षेप की आलोचना की और कहा कि अदालतों ने हाल में कार्यपालिका और नीति संबंधी मामलों में भी अगर साफ-साफ नहीं तो जाहिरा तौर पर ऐसा ही किया है। जबकि संविधान के तहत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन है।न्यायालय ने कहा कि अंतरिम आदेश 'उत्तर प्रदेश में 1998 के जगदंबिका पाल मामले और 2005 में झारखंड के मामले में' संविधान के तहत शक्ति के विभाजन से विचलन का जीता-जागता उदाहरण है।पीठ ने कहा अगर कानून है तो न्यायाधीश उसे लागू करने का आदेश दे सकते हैं। लेकिन वे कानून नहीं बना सकते और न ही ऐसा करने का निर्देश दे सकते हैं। शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए 22 पृष्ठ के अपने फैसले में यह बात कही।बहरहाल पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएस आनंद ने न्यायालय की टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि न्यायिक अनुशासन के तहत बड़ी पीठ के आदेश छोटी पीठ पर लागू होते हैं। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि न्यायिक अनुशासन का हर कोई पालन करे। संवैधानिक विशेषज्ञों ने भी कहा है कि दो सदस्यीय पीठ बड़ी पीठ के आदेश पर टिप्पणी नहीं कर सकती। बड़ी पीठ के आदेश छोटी पीठ के लिए बाध्यकारी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय ने स्वयं ही यह व्यवस्था दी थी कि अगर छोटी पीठ बड़ी पीठ के आदेश से इत्तफाक नहीं रखती है तो उन्हें मामले को बड़ी पीठ के पास भेज देना चाहिए। फैसले में न्यायमूर्ति आनंद के हाल की उस टिप्पणी का भी जिक्र किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि अदालत उस अधिकार को उत्पन्न नहीं कर सकती है जो मौजूद ही नहीं है और न ही ऐसे आदेश दे सकती है जिसे लागू ही नहीं किया जा सकता या वह अन्य कानून या फिर तय कानून सिद्धांतों का उल्लंघन करता हो।